जेएनयू पर जो आज हंस रहे हैं, कल ख़ुद पर रोएंगे

– दिलीप खान

जेएनयू प्रशासन के नए नियम-कायदों के खिलाफ वहां चल रहे प्रदर्शन की आवाज को परिसर तक महदूद रखने की कोशिश में सरकार ने जेएनयू के चारों तरफ पुलिस बल की भारी तैनाती कर रखी है. छात्र-छात्राओं का जत्था जब भी कैंपस से बाहर निकला, पुलिस ने उन पर लाठियां बरसाईं, वाटर कैनन छोड़े और कैंपस को सील कर दिया. इन सबके बीच जेएनयू को अलग-अलग विश्वविद्यालयों से समर्थन भी मिल रहा है और ‘विश्वगुरु’ बनने की चाहत रखने वाले इसी समाज से गालियां भी मिल रही हैं.

कश्मीर और एनआरसी : दुनिया भारत को देख रही है

(पिछले अंक से जारी)

भारत और दुनिया के लिए बड़ा सवाल

नरेंद्र मोदी नीत सरकार की इस भारी और इकतरफा कार्रवाई की कैसे व्याख्या की जाए ? जो लोग कश्मीर के बाहर हैं, उनके लिए इसका क्या महत्व है ?

कश्मीर और एनआरसी : दुनिया भारत को देख रही है

[अमेरिकी सांसदों की एक टीम ने 22 अक्टूबर 2019 को “दक्षिण एशिया में मानवाधिकार” पर एक सुनवाई संचालित की, जिसमें मानवाधिकार की स्थितियों को लेकर भारत, पाकिस्तान तथा कश्मीर के प्रतिनिधियों की बातें सुनी गईं.

दिल्ली में खतरनाक वायु प्रदूषण

दिल्ली का यह शरत काल भारी धुंआ व प्रदूषण के चलते सबसे बुरा बीता है. दिल्ली के लोग पिछले तीन वर्षों से इसके चलते ठीक ढंग से सांस नहीं ले पा रहे हैं. इस वर्ष भी यह समस्या जारी है और प्रदूषण अपनी तमाम सीमाएं पार कर गया है. वायु प्रदूषण और मौसमी अतिशयता एक किस्म का वर्ग युद्ध ही है. गरीब और वंचित लोग ही इसके सर्वाधिक शिकार होते हैं, जबकि जलवायु प्रदूषण के लिये वे जिम्मेवार नहीं हैं. धनी और सुविधा संपन्न लोग तो मास्क और अन्य वायु शोधकों का इस्तेमाल कर सुरक्षित रह जाते हैं, लेकिन गरीब लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं.

‘लालकिले को तोड़ दो आजाद हिंद को छोड़ दो!’

आपको यह नारा अटपटा-सा लग रहा होगा किन्तु ऐसे नारे गुंजायमान थे लाल किले के बाहर, जब आजाद हिन्द फौज के सिपाहियों पर अंग्रेज अदालतों में मुकदमे चल रहे थे. आजाद हिन्द फौज के 17 हजार जवानों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे के विरोध में जनाक्रोश के सामूहिक प्रदर्शन हो रहे थे. इन प्रदर्शनों में पुलिसिया जुल्म से दिल्ली, मुम्बई, मदुराई और लाहौर में 326 से अधिक लोगों की जान चली गयी थी, वे भारत मां के लिए सड़कों पर शहीद हो गये.

27 लोगों की मौत के बाद अब तो जागो! असम के डरावने डिटेंशन कैम्पों ने अब तक 27 लोगों की जान ले ली है

असम में छह स्थानों पर डिटेंशन कैम्प खोले गये हैं जो जिला कारागारों में बने कामचलाऊ किस्म के घर हैं. पिछले 9 वर्षों में इन कैम्पों में गिरफ्तार लोगों में से 27 लोगों की मृत्यु हो चुकी है.

सावरकर: देशभक्त नहीं, कट्टर धर्मांध

मोदी सरकार वीडी सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न (भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार) से नवाजने जा रही है. मोदी और भाजपा दावा कर रहे हैं कि सावरकर “वीर” थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक नायक थे.

बगावत की आहट : चिली में 10 लाख, लेबनान में 20 लाख लोग सड़कों पर उतरे

–  शमशाद इलाही

गुजरा हफ्ता लैटिन अमेरिका में धधकते जनांदोलनों की खबरों से पटा रहा. इक्वेडोर हो या बोलीविया, हैती हो या चिली, जनता ने भ्रष्टाचार, मंहगाई के खिलाफ और जीने के लिए जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार के हक में सड़क पर लामबंदी की है.

सीपीआइ की जन्म शताब्दी: 2020 या 2025 में ?

[ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की मान्यता है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 17 अक्टूबर 1920 को ताशकंद में हुई थी, जिसमें उस वक्त सात सदस्य थे – एम.एन. राय, ईवलीन राॅय-ट्रेंट, अबनी मुखर्जी, रोजा फिटिंगोव, मोहम्मद अली, मोहम्मद शफीक और आचार्य. इसीलिये सीपीआई(एम) 2019-20 को सीपीआई की जन्म शताब्दी मना रही है. मगर क्या ताशकंद की घटना को सचमुच भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म माना जा सकता है? सीपीआई और भाकपा(माले) दोनों की मान्यता है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में ही, कानपुर में हुए उसके पहले सम्मेलन के जरिये हुई थी.