भागवत का भाषण और आरएसएस विचारधारा: एक करीबी नजर

– कविता कृष्णन

पिछले साल की शुरूआत में आरएसएस के राष्ट्रीय सम्मेलन में मोहन भागवत के भाषण दोहरी-जुबान बोलने के ही थोड़े जटिल प्रयास थे, जिसमें उन्होंने संघी विचारधारा के तत्वों पर ‘उदार’ रंग चढ़ाने की कोशिश की थी.

करीब से देखें, तो भागवत संघी विचारधारा से तनिक भी नहीं हिले हैं. यह तो भारतीय मीडिया (अथवा इसका अधिकांश हिस्सा) है जो उनके भाषणों को ठीक से जांच-परख का अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सका और आलोचनात्मक ढंग से देखने के बजाय उनके जुमलों को बस, यूं ही दुहराता रहा.

भाकपा(माले) सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन की अगली कतार में है

चंपारण में ‘संविधान बचाओ’ आंदोलन

पश्चिम चंपाररण जिला जो गुलाम भारत में महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासकों द्वारा नील की खेती करने को बाध्य किए जानेवाले किसानों के सत्याग्रह आंदोलन की वजह से देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, आज देश में उठ खड़े हुए सीएए, एनआरसी व एनपीआर विरोधी आंदोलन में भी कूद पड़ा है.

शाहीन बाग अब किसी जगह का नाम भर नहीं

[लोगों की बातचीत और सोशल मीडिया में ‘शाहीन बाग’ की चर्चा आम है. हमें उसे करीब से देखने का मौका मिला –  आसपास भी और सुदूर राज्यों में भी. पिछले साल के15 दिसंबर से लेकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक दिल्ली का शाहीन बाग जाग रहा है. प्रस्तुत है इन शाहीन बागों पर एक रिपोर्ट.]
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संविधान, नागरिकता, लोकतंत्र की रक्षा करें एनपीआर, एनआरसी, सीएए का प्रतिरोध करें

(पिछले अंक से जारी)

सरकार दावा कर रही है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी का आपस में कोई रिश्ता नहीं है और एनआरसी का किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. सच्चाई क्या है?

खुद अमित शाह ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के जुड़े होने की बात बार-बार कही है.

संविधान, नागरिकता, लोकतंत्र की रक्षा करें! एनपीआर, एनआरसी, सीएए का प्रतिरोध करें!

समूचे भारत में लोग नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रतिवाद कर रहे हैं, जिसे भाजपा सरकार ने दिसम्बर 2019 में संसद से पास करा लिया है.

लोगों ने इस बात को पहचान लिया है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) साम्प्रदायिक और गैर-संवैधानिक है, और सीएए के साथ अखिल भारतीय राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को जोड़ देने से मुसलमान नागरिकों को घुसपैठिया करार देने तथा गैर-मुस्लिम नागरिकों को “शरणार्थी” में बदल देने का खतरा सामने खड़ा हो जाता है.

मौजूदा दौर में मजदूर वर्ग आंदोलन केे समक्ष चुनौतियां : बदलती संरचना, उभरती चुनौतियां और हमारा दृष्टिकोण

मजदूर वर्ग विखंडित हो रहा है. देश में कुल गैर-कृषि कार्यबल, मजदूरों की कुल संख्या का 45 प्रतिशत और देश में कुल गैर-कृषि अनौपचारिक कार्यबल का 54 प्रतिशत स्वयं-नियोजित, सूक्ष्म उद्यमी या मार्क्सवादी भाषा में निम्न पूंजीपति (पेट्टी बुर्जुआ) है. स्वरोजगार के बीच भी विभिन्न श्रेणियां हैं.

लोकतंत्र के दमन पर उतरी योगी सरकार के खिलाफ वाम-लोकतांत्रिक ताकतों का बढ़ता प्रतिरोध

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) व एनआरसी के विरुद्ध 19 व 20 दिसंबर को लखनऊ, बनारस, कानपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मेरठ आदि समेत उत्तर प्रदेश के कई शहरों में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए. जामिया मिल्लिया से लेकर अलीगढ़, बनारस व लखनऊ विश्वविद्यालयों के छात्र व युवा बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे और पुलिसिया दमन का मुकाबला किया. इन प्रदर्शनों पर पुलिस द्वारा चलाई गई लाठी-गोली से लगभग डेढ़ दर्जन प्रदर्शनकारी मारे गए. आधिकारिक तौर पर यूपी पुलिस के मुखिया ने कहीं भी ‘पुलिस द्वारा एक भी बुलेट नहीं चलाने’ की बात कही, लेकिन इन प्रदर्शनों के बाद उपलब्ध हुए वीडियो से उनका झूठ पकड़ा गया.

यह जन उभार ऐतिहासिक है

– रामजतन शर्मा

गोरे साहबों की हुकूमत से आजादी के संघर्ष में शहीद हुए तीन देशभक्त नायकों – रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खां और ठाकुर रोशन सिंह की साझी शहादत-साझी विरासत के अवसर पर 19 दिसंबर 2019 को भारत ने एक बार फिर अखिल भारतीय ऐतिहासिक जनउभार देखा. इस बार यह जनउभार भूरे साहबों – संघ-भाजपा, मोदी-शाह की स्वेच्छाचारी निरंकुश हुकूमत के खिलाफ था, उस हुकूमत के खिलाफ जो दश को टुकड़े-टुकड़े कर देने, देश में तबाही मचा देने, लोकतंत्र व संविधान को खत्म कर फासीवादी शासन लागू करने पर आमादा है.

समय के गीत

अब कहता है कि पूरा मकान उसका है

न घर बनाने में था न घर बसाने में था
अब कहता है कि पूरा मकान उसका है
न जंग लड़ी न एक कतरा ख़ून बहाया
आज कहता है सारा हिन्दुस्तान उसका है
गुलो-बुलबुल की अस्मत से खेलने वाला
कमबख्त कहता है गुलिस्तान उसका है
सारे टीवी अखबार खुशामद में लगे हैं
नीचे से ऊपर तक खानदान उसका है
हम अपने ही भाई को दुश्मन मान लें
कितना बेबुनियाद फरमान उसका है