एनसीआरबी के आंकड़े: दर्पण झूठ न बोले

भाजपा-आरएसएस द्वारा मानवाधिकारों का अपमान

मोदी सरकार ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों को पूरे एक साल तक लटकाए और दबाए रखा. मगर अंत में 2017 के आंकड़ों को उसको 2019 में जारी करना पड़ा है. एनसीआरबी ने पहले यह बहाना बनाया था कि यह देरी अंशतः इस कारण हो रही है कि आंकड़ों को संग्रहीत करने और उन्हें चंद नए उपशीर्षकों जैसे भीड़-हत्याएं, खाप पंचायत के आदेश पर की गई हत्याएं आदि में व्यवस्थित करने में समय लग रहा है.

झुके सारे नियम कानून सत्ता के सामने

वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति. दुराचार-भ्रष्टाचार यदि भाजपा या उसके समर्थकों का हो, तो वह भी दुराचार-भ्रष्टाचार न भवति. यह इस देश में नयी परिपाटी स्थापित की जा रही है. शायद यही वो न्यू इंडिया हो, जिसका नारा गाहे-बगाहे खूब उछाला जाता है. ताजातरीन उदाहरण सिक्किम का है. सिक्किम में इसी वर्ष अप्रैल में विधानसभा के चुनाव हुए थे. इस चुनाव में सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा ने जीत हासिल की. इस जीत के बाद प्रेम सिंह तमांग मुख्यमंत्री चुने गए.

सावरकर के बारे में क्या बताती है कपूर आयोग की रिपोर्ट

[ भाजपा ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में वीडी सावरकर को भारत रत्न देने की घोषणा की है. इसके घोषणापत्र में शामिल होने के साथ ही नया विवाद खड़ा हो गया है. सबसे बड़ा एतराज तो इसी बात को लेकर है कि इतने बड़े सम्मान को चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है. ऊपर से जिस शख्स को देने की बात की जा रही है वह खुद इतिहास का सबसे विवादित व्यक्ति रहा है.

धारा 370 का खात्मा: बिहार के मजदूरों की रोजी-रोटी पर हमला

– कुणाल, बिहार राज्य सचिव, भाकपा(माले)

मुझे जानकारी थी कि पूरे बिहार की ही तरह पश्चिम चंपारण से गरीब-गुरबे रोजी-रोटी की तलाश में बाहर काम करने जाते हैं – बल्कि यहां से कुछ ज्यादा ही लोग जाते हैं. लेकिन यह पता नहीं था कि कश्मीर उनका पसंदीदा राज्य है. पूरे भरोसे व सम्मान के साथ वहां उन्हें काम करने का मौका मिलता है. बाहर से काम करने आए मजदूरों के साथ मेहमान की तरह स्थानीय लोगों का व्यवहार होता है.

आयुर्वेद पढ़ने वालों के अभिभावकों की जेबें काटने और छात्र-छात्राओं को पुलिसिया लात-घूसों से पिटवा कर बनेगा आयुष प्रदेश?

19 अक्टूबर की शाम को देहारादून के परेड ग्राउंड स्थित धरना स्थल पर पुलिस ने एकाएक धावा बोल दिया. वहाँ बीते कई दिनों से विभिन्न आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का धरना और आमरण अनशन चल रहा था. पुलिस का निशाना इन्हीं छात्र-छात्राओं का तम्बू था. घोषित तौर पर उद्देश्य था लगभग 7-8 दिन से आमरण अनशन पर बैठे एक छात्र को उठाना. लेकिन छात्र-छात्राओं का कहना है कि पुलिस ने उन पर लात-घूंसों से प्रहार किया.

मोदी और ट्रम्प : एक मंच पर दो फासिस्ट

प्रधानमंत्री मोदी के अमरीका सफर के दौरान ह्यूस्टन में हुई उनकी रैली में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मौजूदगी ने दोनों धुर दक्षिणपंथी फासिस्ट राजनीतिज्ञों की वैचारिक नजदीकी को ही रेखांकित किया है.

आर्थिक मंदी (स्लोडाउन): जड़ में है गंभीर असमानता – सबका साथ, किंतु सिर्फ अदानी-अंबानी का विकास

– सौरभ नरुका

आर्थिक मंदी (स्लोडाउन) की चर्चाएं आज चारों ओर हो रही हैं और दिन-प्रतिदिन आर्थिक गतिविधियां कम-से-कमतर होते जाने के साथ आम लोग इस स्लोडान का असर महसूस करने लगे हैं. इसे नजरअंदाज करने के सारे सरकारी प्रयास नाकाम हो गए और हर दिन आॅटोमोबाइल, टेक्सटाइल्स, जमीन व आवास कारोबार आदि पर असर डालने वाले स्लोडाउन की खबरें सामने आ रही हैं. जहां आॅटो क्षेत्र की बिक्री लगातार 10 महीनों से कम होती गई है, वहीं औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि इस जून महीने में नाटकीय रूप से 2 प्रतिशत के निम्न स्तर पर गिर गई.

गांडेय विधानसभा क्षेत्र में जनसंवाद

‘पार्टी की केंद्रीय कमेटी के आह्वान एकजुट हो-प्रतिरोध करो’ के साथ गांडेय विधानसभा क्षेत्र में लगातार जनसंवाद कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इस दौरान गांव-गांव में स्थानीय लोगों के साथ बैठकर उनके सवालों पर चर्चा तथा पार्टी की ओर से मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति पर भी बात की जा रही है. विगत लोकसभा चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन, वोटों में आई अप्रत्याशित गिरावट के कारणों को ढूंढने का प्रयास तथा इसके साथ ही आगामी विधाानसभा चुनाव को लेकर कैसे चीजों को ठीक किया जाए इसे लेकर भी बातें हो रही हैं.

किसान और कार्ल मार्क्स

– गोपाल प्रधान

मार्क्स के लेखन और चिंतन के बारे में आम तौर पर माना जाता है कि उनकी चिंता का विषय केवल औद्योगिक मजदूर थे लेकिन सोचने की बात है कि अगर ऐसा ही होता तो अनेक ऐसे देशों में कम्युनिस्ट पार्टियों की लोकप्रियता कैसे बढ़ती जहां खेतिहर आबादी अधिक है! यूरोप के देशों में भी उद्योगीकरण से पहले किसानों की आबादी ही थी जिसे खेती से उजाड़कर उद्योगों में काम करने वाले कामगार बनाया गया. यहां तक कि रूस में भी क्रांति के समय औद्योगिक मजदूरों के मुकाबले किसानों की तादाद अधिक थी. चीन तो क्रांति के समय खेतिहर मुल्क ही था.

नया व्हीकल कानून, आम जनता के पाकेट की लूटमारी है

– रामजतन शर्मा

मोदी सरकार ने आनन-फानन में नया व्हीकल कानून बनाकर ट्रैफिक टैक्स को बेतहाशा बढ़ा दिया और आनन-फानन में ही उसे लागू भी कर दिया. सच कहिए तो ऐसा लगता है कि जनता पर यह ’आर्थिक सर्जिकल स्ट्राइक’ है! न तो कानून लागू करने वाली एजेंसी, पुलिस महकमा को और न ही आम अवाम को यह मालूम है कि यह कानून है क्या? उसमें क्या प्रावधान हैं? भारी टैक्स बढ़ोतरी और आनन-फानन में उसे अंजाम दिए जाने के पीछे सरकार के क्या तर्क हैं? इन सब चीजों की आम अवाम को जानकारी देने को सरकार अपनी जिम्मेदारी व फर्ज को नहीं समझती है.