भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के सौ साल : उपलब्धियां, सीख और चुनौतियां

- दीपंकर भट्टाचार्य

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन अब सौ साल पुराना हो चुका है. हालांकि कम्युनिस्ट पार्टी के वास्तविक स्थापना दिवस को लेकर अलग-अलग राय हैं, लेकिन सीपीआई और सीपीआई(एमएल) दोनों 26 दिसंबर 1925 को सीपीआई के औपचारिक स्थापना दिवस के रूप में मान्यता देते हैं. तथ्यों के अनुसार, 1920 का शुरुआती दशक वह समय था जब कम्युनिस्ट विचार और गतिविधियां भारत में आकार लेने लगी थीं, और इस प्रकार यह आंदोलन भारत में स्पष्ट रूप से सौ वर्षों का हो चुका है.

उत्तरी गाजा में इजरायल ने मौत को रहम बना दिया है

मेरे परिवार को इजरायली ड्रोन द्वारा निशाना बनाया जा रहा है, और जो बचे हैं, उन्हें भूख से मौत का सामना करना पड़ रहा है – शहद अबुसलामा

अमेरिकी चुनाव के चरम पर एक नाटकीय कदम में, जो बिडेन ने धमकी दी थी कि अगर एक महीने के भीतर गाजा में अधिक मानवीय सहायता नहीं पहुंचाई गई तो इजरायल को सैन्य आपूर्ति प्रतिबंधित कर दी जाएगी.

उनकी समय-सीमा बीत गई, और घेराबंदी जारी रही, जिससे फिलिस्तीनियों को ‘तत्काल’ भुखमरी का खतरा है.

‘पवित्र’ गाय और ‘अपवित्र हिंसा’ : हरियाणा में हालिया घटनाएं

- आकाश भट्टाचार्य

एक ‘हिंदू’ पीड़ित

23 अगस्त 2024 को, आर्यन मिश्रा ने हरियाणा के पलवल के पास एक हाईवे पर गोली लगने से अपनी जान गंवा दी. उसकी गलती : संभवतः वह एक मुस्लिम और ‘गाय तस्कर’ हो सकता था. उसके हत्यारों ने ये स्वीकार किया है.

एकता रैली : धनबाद का गोल्फ मैदान फिर से रच गया नया इतिहास

धनबाद के ऐतिहासिक गोल्फ मैदान में विगत 9 सितंबर को भाकपा-माले में मासस के विलय की औपचारिक घोषणा के साथ ही झारखंड में वामपंथी आंदोलन के एक नए अध्याय की शुरूआत हो गई. मासस के कार्यकारी अध्यक्ष सह निरसा के पूर्व विधयक अरूप चटर्जी ने इस विलय की घोषणा की. दोनों दलों के हजारों समर्थक इस ऐतिहासिक विलय के गवाह बने. सभा में उमड़ा जनसैलाब करतल ध्वनियों और नाच-गानों के साथ इस एकता का स्वागत कर रहा था. निरसा, सिंदरी, झरिया समेत गिरीडीह, बगोदर, हजारीबाग समेत बिहार के समर्थक भारी संख्या में जनसभा में पहुंचे थे.

संथाल परगना के बांग्लाभाषी मुसलमान भारतीय हैं न कि बांग्लादेशी घुसपैठिये

झारखंड जनाधिकार महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियान की तथ्यान्वेषण रिपोर्ट

हाल के दिनों में भाजपा लगातार प्रचार कर रही है कि संथाल परगना में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए आ रहे हैं जो आदिवासियों की जमीन हथिया रहे हैं, आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं और आदिवासियों की जनसंख्या कम हो रही है. क्षेत्र में हाल की हिंसा की कई घटनाओं को जोड़ते हुए इन दावों पर सामाजिक व राजनैतिक माहौल बनाया जा रहा है.

जम्मू-कश्मीर चुनाव : बे-ताकत विधानसभा के लिए कशमकश

- अनुराधा भसीन

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों का मतलब चुनावों के ऐलान के पहले ही पूरी तरह से बदल गया था. पहला बड़ा बदलाव जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लाने  के बाद  हुआ, जिसने राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों – लद्दाख (बिना निर्वाचित विधानसभा के) और जम्मू-कश्मीर (निर्वाचित विधानसभा के साथ) में विभाजित कर दिया. इसके बाद हुए बदलावों ने संशय को और बढ़ा दिया.