उत्तराखंड में जमीन, खेती और भू-कानून

- इन्द्रेश मैखुरी

उत्तराखंड में काफी अरसे से भू-कानून की चर्चा चल रही है. चर्चा में सरकार की तरफ से और सरकार के सामने जो दिखाई दे रहे थे (पता नहीं वो सरकार के सामने है कि नहीं, लेकिन दिखाई दे रहे थे), दोनों तरफ का जुमला एक ही रहा  है कि सख्त भू कानून चाहिए!

भू कानून और कथित सख्त वाले भू कानून की चर्चा के इस सिलसिले में समझना जरूरी है कि बात शुरू कहां से हुई.

एसएपीएफ का ‘काठमांडू घोषणा पत्र’

दक्षिण एशिया में खाद्य संप्रभुता, जलवायु न्याय और किसानों के अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए

नेपाल की राजधानी काठमांडू में 20-21 मार्च को आयोजित ‘दक्षिण एशिया किसान फेडरेशन, (एसएपीएफ) के पांचवें सम्मेलन ने भारत के किसान नेताओं के प्रस्ताव पर हर वर्ष 26 नवम्बर को पूरे दक्षिण एशिया में ‘किसान संघर्ष दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला लिया है. 26 नवम्बर 2020 को खेती के कारपोरेटीकरण के लिए लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ भारत के ‘एतिहासिक किसान आन्दोलन’ की शुरुआत हुई थी.

मोदी सरकार के ट्रंप प्रशासन के आगे आत्मसमर्पण का भारत को विरोध करना होगा

ट्रंप 2.0 की शुरुआत बेहद आक्रामक अंदाज में हुई है. 2016 की संकीर्ण जीत और 2020 की हार के मुकाबले, इस बार उनकी जीत कहीं अधिक जबरदस्त रही. दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद, डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेलगाम दबंग की तरह अपनी मनमानी नीतियों को थोपने में कोई देर नहीं की.

बदलो बिहार महाजुटान ने तय किया बिहार में बदलाव का एजेंडा

पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान एक और इतिहास रच गया. विगत 8 महीनों से विभिन्न आंदोलनकारी ताकतों व सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाने की कोशिशों ने रंग दिखाया और 2 मार्च को ‘बदलो बिहार महाजुटान’ का मंच ऐसे ही संगठनों का साझा मंच बन गया. इसने बिहार की बदहाल स्थिति और पिछले 20 वर्षों से जारी भाजपा-जदयू शासन के खिलाफ एक नए बिहार के निर्माण के संघर्ष की आधारशिला रखने का काम किया. बदलो बिहार का एजेंडा अब राज्य की अन्य राजनीतिक पार्टियों का भी एजेंडा बनने लगा है. भाकपा(माले) की यह पहलकदमी चौतरफा चर्चा का विषय बनी.

मजदूर और किसान ही देश के असली मालिक – का. दीपंकर भट्टाचार्य

(ऐक्टू के 11 वें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन वक्तव्य)

जो बिरसा मुंडा ने कहा, ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ (अपने देश में अपना हक, अपना राज) वही वह आवाज है, जो 1857 से लेकर 1949 में जब देश में संविधान पारित हुआ और 1950 में जब रिपब्लिक की स्थापना हुई, तब भी गूंजी. आज इस आवाज को और ज्यादा बुलंद करने की जरूरत है, क्योंकि हमारे देश में आज एक ऐसी सरकार है जो इस देश के मजदूर-किसानों – इस देश को बनाने वालों और इस देश को चलाने वालों, इस देश की आम-आवाम –  सबके खिलाफ खड़ी है.

भारत में फासीवाद की शिनाख्त : अगर अब नहीं, तो कब?

सीपीआई(एम) के आगामी 24वें कांग्रेस से पहले पार्टी की पोलित ब्यूरो द्वारा जारी एक आंतरिक नोट, जिसे मीडिया में प्रमुखता से रिपोर्ट किया गया है, पर पहले जारी हुए मसौदा प्रस्ताव से कहीं ज्यादा चर्चा हो रही है. इस मसौदे में दो जगहों पर मौजूदा राजनीतिक हालात और मोदी सरकार को "नव-फ़ासीवादी लक्षणों" वाला बताया गया है. इस आंतरिक नोट में स्पष्ट किया है कि "नव-फ़ासीवादी लक्षणों" का अर्थ केवल कुछ ख़ास विशेषताएँ या रुझान हैं, और मोदी सरकार किसी भी तरह से फ़ासीवादी या नव-फ़ासीवादी नहीं है.