इस साल का बजट मोदी सरकार की तबाही फैलाने वाली नीतियों का ही अगला चरण है. इसमें बेरोजगारी, महँगाई, खेती की बदहाली और घटती मजदूरी से पहाड़ों तले कराहती आम अवाम के लिए कोई राहत नहीं है.
जैसा कि बजट दस्तावेज खुद कहता है, सम्पूर्ण रोजगार में कैजुअल श्रम का प्रतिशत घट गया है. और भाजपा सरकार श्रमशक्ति का कैजुअलाईजेशन कर रही है! रोजगार के मामले में यह एक खौफनाक परिदृश्य है. ‘स्व-रोजगार’ श्रम अभी भी उतना ही है जितना वह आठ साल पहले 2011 में था – 50 प्रतिशत. यह आँकड़ा भी भी बढ़ती बेरोजगारी की तरफ ही इशारा करता है.