दिल्ली में भाजपा प्रायोजित हिंसा के प्रतिकार का आह्वान

भाकपा(माले) ने दिल्ली में भाजपा-आरएसएस के गुंडों द्वारा दिल्ली पुलिस की खुलेआम सरपरस्ती में चल रहे हिंसक अभियान और आगजनी की कड़ी निंदा करते हुए इस जनसंहार, दंगे और आगजनी को उकसाने के लिए जिम्मेवार भाजपा नेता कपिल मिश्रा की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की है तथा मुल्क के तमाम अमन-पसंद लोगों से राजधानी में चल रही इस राज्य प्रायोजित भाजपा-नीत साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने की अपील की है.

जनसंख्या नियंत्रण महिला विरोधी है, प्रजनन-सम्बंधी न्याय नहीं

– कविता कृष्णन

बलपूर्वक जनसंख्या नियंत्रण के कदमों को लागू करने के लिये एक संविधान संशोधन विधेयक 7 फरवरी 2020 को राज्य सभा में पेश किया गया. यह एक ऐसा संविधान संशोधन विधेयक है जो दो से अधिक बच्चों वाले नागरिकों के संवैधानिक रूप से गारंटीशुदा अधिकारों को प्रतिबंधित करता है. यह जनसंख्या नियंत्रण का एक निरंकुश, अत्याचारी कदम है.

चंपारण में भूस्वामियों के पक्ष में लाठी लेकर खड़ी है पुलिस -- माले नेता की पिटाई निंदनीय

भाकपा(माले) के राज्य सचिव कुणाल और चंपारण के लोकप्रिय माले नेता वीरेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने कहा है कि एक तरफ सरकार एनपीआर लागू करने का नोटिफिकेशन जारी कर गरीबों को नागरिकता से बेदखल कर रही है, तो दूसरी ओर वर्षें से जमीन पर बसे और उस पर फसल उपजाने वाले गरीब किसानों की उनकी जमीन से बेदखली का कार्यक्रम भी अनवरत जारी है. चंपारण के इलाके में प्रशासन पूरी तरह से भूस्वामियों की लठैती कर रहा है. वहां के डीएम प्रशासन का गैरकानूनी इस्तेमाल करके गरीबों को सीलिंग की जमीन से बेदखल करने का अभियान चलाये हुए हैं और लहलहाती फसलों को काट लेने में भी कोई संकोच नहीं कर रहे हैं.

बजट 2020-21: आर्थिक संकट से कोई निजात नहीं

इस साल का बजट मोदी सरकार की तबाही फैलाने वाली नीतियों का ही अगला चरण है. इसमें बेरोजगारी, महँगाई, खेती की बदहाली और घटती मजदूरी से पहाड़ों तले कराहती आम अवाम के लिए कोई राहत नहीं है.

जैसा कि बजट दस्तावेज खुद कहता है, सम्पूर्ण रोजगार में कैजुअल श्रम का प्रतिशत घट गया है. और भाजपा सरकार श्रमशक्ति का कैजुअलाईजेशन कर रही है! रोजगार के मामले में यह एक खौफनाक परिदृश्य है. ‘स्व-रोजगार’ श्रम अभी भी उतना ही है जितना वह आठ साल पहले 2011 में था – 50 प्रतिशत. यह आँकड़ा भी भी बढ़ती बेरोजगारी की तरफ ही इशारा करता है.

बोडो समझौता पर भाकपा(माले) का वक्तव्य

बोडो क्षेत्र में शांति के लिए उठाया गया हर कदम स्वागत-योग्य है. और, इस तरह से बोडो समझौते को तमाम बोडो ग्रुपों का समर्थन प्राप्त है और असम में भी बहुत लोग इसकी तरफदारी कर रहे हैं. लेकिन साथ ही, कई आशंकाएं और सवाल हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता है. समझौते की शर्तें बीटीएसी क्षेत्र में गैर-बोडो जनता के अधिकारों के बारे में चिंता पैदा करती हैं. खासकर ऐसा तब होता है, जब खबरों के मुताबिक संबंधित क्षेत्र के निर्वाचित सांसद को समझौता संपन्न करते वक्त विश्वास में नहीं लिया गया.

प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र

• भाजपा को वोट दो, नहीं तो तुम्हारे साथ बलात्कार होगा – दिल्ली की महिलाओं के लिए क्या आपका यही संदेश है?
• आपकी पार्टी भी महिलाओं और बच्चों को गोली का निशाना बनाने के लिए भीड़ को उकसा रही है.

गैंगरेप के दोषियों को फांसी की सजा पर ऐपवा का वक्तव्य

हम ज्योति के माता-पिता की पीड़ा और आक्रोश के प्रति अपनी संवेदना जाहिर करते हैं, जिन्हें कुछ तसल्ली मिल सकती है अगर अपराध्यिों को फांसी मिले. लेकिन हर तरह से और हर दिन महिलाओं के मामले में नाकाम सत्ता और समाज को इस बात की इजाजत नहीं देनी चाहिए कि वह चंद लोगों की जान लेकर अपने पापों को धो सके और उन मूलभूत बदलावों की ओर से हमारा ध्यान भटका सके जो महिलाओं की जिंदगी को और ज्यादा सुरक्षित तथा आजाद बनाने के लिये जरूरी हैं.

देश में सीरियल इमरजेंसी, 24 फरवरी को पटना में विधानसभा मार्च

मोदी सरकार ने शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों व प्रदर्शनकारियों को चुप कराने के लिए पुलिस को अंधधुंध शक्तियां देते हुए सीएए-एनआरसी व एनपीआर और सीरियल इमरजेंसी के माध्यम से संविधान व लोकतंत्र के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है.

नीतीश जी संविधान व धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा का दावा करते हैं, लेकिन उनका यह दावा पूरी तरह तार-तार हो चुका है. बिहार विधन सभा से पहलकदमी लेते हुए नीतीश जी सीएए-एनआरसी-एनपीआर को लागू न करने का प्रस्ताव पारित करवाएं.

यूपी में लोकतांत्रिक अधिकारों पर दमन की भर्त्सना

एआइपीएफ और नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने 20 जनवरी 2020 को इलाहाबाद कलक्टर से मुलाकात कर उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों के दमन और पूर्व आइएएस अधिकारी कन्नन गोपीकृष्णन को 18 जनवरी के दिन इलाहाबाद हवाई अड्डे से ही वापस दिल्ली लौटने को मजबूर किए जाने के खिलाफ एक ज्ञापन सौंपा. गोपीकृष्णन एआइपीएफ और नागरिकों द्वारा उस दिन आयोजित किए जा रहे एक सिंपोजियम में हिस्सा लेने आ रहे थे.

इस सिंपोजियम के माध्यम से निम्नलिखित मांगों के प्रति प्रशासन के आचरण की भर्त्सना करते हुए सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया गया:

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंसा और – कुलपति को हटाने की जरूरत के बारे में वक्तव्य

5 जनवरी 2020 की शाम में हथियारबंद गुंडों के एक ग्रुप द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में किए गए भयावह हमले को जान कर हम मर्माहत और भयभीत हैं. इन गुंडों ने शिक्षकों और छात्रों की एक शांतिपूर्ण सभा को अपना निशाना बनाया था. हमने देखा कि फीस वृद्धि –  जिसके चलते वहां के लगभग आधे छात्र पढ़ाई छोड़ने को बाध्य हो जाएंगे –  के खिलाफ छात्रों के लंबे संघर्ष की पृष्ठभूमि में और तीन वर्षों से भी ज्यादा समय से जेएनयू के कुलपति की अनेक मनमानी व गैर-कानूनी हरकतों के खिलाफ जेएनयू के शिक्षकों व छात्रों के प्रतिवादों के और बड़े सिलसिले के बाद यह भयानक धटना हुई है.