बदलो बिहार महाजुटान ने तय किया बिहार में बदलाव का एजेंडा

पटना का ऐतिहासिक गांधी मैदान एक और इतिहास रच गया. विगत 8 महीनों से विभिन्न आंदोलनकारी ताकतों व सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाने की कोशिशों ने रंग दिखाया और 2 मार्च को ‘बदलो बिहार महाजुटान’ का मंच ऐसे ही संगठनों का साझा मंच बन गया. इसने बिहार की बदहाल स्थिति और पिछले 20 वर्षों से जारी भाजपा-जदयू शासन के खिलाफ एक नए बिहार के निर्माण के संघर्ष की आधारशिला रखने का काम किया. बदलो बिहार का एजेंडा अब राज्य की अन्य राजनीतिक पार्टियों का भी एजेंडा बनने लगा है. भाकपा(माले) की यह पहलकदमी चौतरफा चर्चा का विषय बनी.

मजदूर और किसान ही देश के असली मालिक – का. दीपंकर भट्टाचार्य

(ऐक्टू के 11 वें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन वक्तव्य)

जो बिरसा मुंडा ने कहा, ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ (अपने देश में अपना हक, अपना राज) वही वह आवाज है, जो 1857 से लेकर 1949 में जब देश में संविधान पारित हुआ और 1950 में जब रिपब्लिक की स्थापना हुई, तब भी गूंजी. आज इस आवाज को और ज्यादा बुलंद करने की जरूरत है, क्योंकि हमारे देश में आज एक ऐसी सरकार है जो इस देश के मजदूर-किसानों – इस देश को बनाने वालों और इस देश को चलाने वालों, इस देश की आम-आवाम –  सबके खिलाफ खड़ी है.

भारत में फासीवाद की शिनाख्त : अगर अब नहीं, तो कब?

सीपीआई(एम) के आगामी 24वें कांग्रेस से पहले पार्टी की पोलित ब्यूरो द्वारा जारी एक आंतरिक नोट, जिसे मीडिया में प्रमुखता से रिपोर्ट किया गया है, पर पहले जारी हुए मसौदा प्रस्ताव से कहीं ज्यादा चर्चा हो रही है. इस मसौदे में दो जगहों पर मौजूदा राजनीतिक हालात और मोदी सरकार को "नव-फ़ासीवादी लक्षणों" वाला बताया गया है. इस आंतरिक नोट में स्पष्ट किया है कि "नव-फ़ासीवादी लक्षणों" का अर्थ केवल कुछ ख़ास विशेषताएँ या रुझान हैं, और मोदी सरकार किसी भी तरह से फ़ासीवादी या नव-फ़ासीवादी नहीं है.

गाज़ा युद्धविराम के बाद, इज़रायल का कब्जाधीन वेस्ट बैंक पर नरसंहारक हमला

गाज़ा की घिरी हुई आबादी पर 471 दिनों से अधिक समय तक क्रूर और सर्वनाशकारी युद्ध छेड़ने के बाद, नेतन्याहू के नेतृत्व वाली इज़रायली सरकार को युद्धविराम के लिए मजबूर होना पड़ा. 15 जनवरी, 2025 को घोषित और 19 जनवरी से लागू इस समझौते ने उस निर्मम बमबारी को रोक दिया, जिसने पूरे गाज़ा को मलबे में तब्दील कर दिया.

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन का शताब्दि समारोह मनाते हुए फासीवाद के खिलाफ संघर्ष में साम्यवाद का परचम बुलंद करें !

- अरिंदम सेन

19वीं शताब्दि के उत्तरार्ध से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारत का राष्ट्रीय संग्राम अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक धाराओं के प्रति काफी प्रतिक्रियाशील रहा है. ऐसे बहुत सारे प्रमाण हैं, जो यह दर्शाते हैं कि प्रबुद्ध भारतीय, समाजवाद की फेबियन एवं अन्य धाराओं से वाकिफ थे, भले ही यह जानकारी काफी सतही थी (उदाहरण के लिए विवेकानंद की टिप्पणी याद करें : मैं एक समाजवादी हूं.)