गाज़ा की घिरी हुई आबादी पर 471 दिनों से अधिक समय तक क्रूर और सर्वनाशकारी युद्ध छेड़ने के बाद, नेतन्याहू के नेतृत्व वाली इज़रायली सरकार को युद्धविराम के लिए मजबूर होना पड़ा. 15 जनवरी, 2025 को घोषित और 19 जनवरी से लागू इस समझौते ने उस निर्मम बमबारी को रोक दिया, जिसने पूरे गाज़ा को मलबे में तब्दील कर दिया.
इज़रायल द्वारा गाज़ा पर किए गए नरसंहारक हमले की मानवीय त्रासदी अभूतपूर्व और बेहद भयावह है. युद्धविराम लागू होने से पहले, आधिकारिक तौर पर 47,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे गए, जिनमें अधिकांश महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग थे. यह आंकड़ा केवल अस्पतालों में दर्ज मौतों पर आधारित है और विनाश की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता, क्योंकि हजारों शव अब भी मलबे के नीचे दबे हुए हैं जिन्हें सिविल डिफेंस टीम बाहर नहीं निकाल सके. गाज़ा पट्टी में फैली लाशें और बिखरे मानव अवशेष इज़रायली सेना द्वारा की गई बमबारी और त्वरित हत्याओं के गवाह हैं. लैंसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार, गाज़ा में मौतों का आंकड़ा आधिकारिक रिपोर्ट से 41 प्रतिशत अधिक है.
पूरे के पूरे परिवार नागरिक रिकॉर्ड से मिटा दिए गए, मोहल्ले मलबे में तब्दील होकर धूल-धूसरित हो गए, और आवश्यक बुनियादी ढांचे पूरी तरह नष्ट कर दिए गए. अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें, और विस्थापित नागरिकों के लिए आश्रय स्थल—इन सभी को सुनियोजित तरीके से उस अभियान में निशाना बनाया गया, जिसका उद्देश्य केवल गाज़ा के लोगों का मनोबल तोड़ना नहीं, बल्कि उनके पूरे अस्तित्व को ही मिटाना था.
अकल्पनीय तबाही का सामना करने के बावजूद, गाज़ा के लोगों ने असाधारण जज़्बा और दृढ़ता दिखाई है. मलबे के बीच मुस्कुराते और खेलते बच्चों की तस्वीरें, और “हम गाज़ा को और खूबसूरत बनाएंगे” दोहराते, मलबा हटाते बचे हुए लोग, इज़रायल के नरसंहारक अपराधों के खिलाफ उनके अटूट साहस का जीवंत प्रमाण हैं. गाज़ा के लोग आज भी आज़ादी और न्याय के अपने सपने को मजबूती से संजोए हुए हैं, यह साबित करते हुए कि प्रलयकारी विनाश के सामने भी उनके हौसले और जज़्बे को कभी तोड़ा नहीं जा सकता.
युद्धविराम ने भले ही गाज़ा को अस्थायी राहत दी हो, लेकिन इससे इज़रायल की व्यापक नरसंहारक महत्वाकांक्षाओं पर कोई रोक नहीं लगी है. गाज़ा के युद्धविराम की आड़ में, इज़रायल की नरसंहारी मशीनरी ने अपना पूरा ध्यान कब्जाधीन वेस्ट बैंक पर केंद्रित कर दिया है.
21 जनवरी को, इज़रायली सेना ने जेनिन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया, जिसमें हवाई हमले, घरों और सड़कों को नष्ट करना, और शहर की घेरेबंदी जैसी क्रूर कार्रवाइयाँ शामिल हैं. सड़कों पर चलते लोगों को इज़रायली निशानेबाज़ों द्वारा बिना किसी जवाबदेही के बेखौफ मार दिया जा रहा है. सिर्फ पिछले कुछ हफ्तों में ही 13 से अधिक फ़िलिस्तीनी, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, मारे गए हैं.
जेनिन पर हमले के साथ-साथ, कब्जाधीन वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनी समुदायों के खिलाफ इज़रायली उपनिवेशवादियों की हिंसा अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई है. बुरिन, हुवारा, और मसाफ़र यत्ता जैसे फ़िलिस्तीनी गांवों को सुनियोजित नरसंहार जैसी हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.
इज़रायली राज्य के समर्थन से उपनिवेशवादी घरों को जला रहे हैं, प्राचीन जैतून के पेड़ों को उखाड़ रहे हैं, और फ़िलिस्तीनी नागरिकों की सरेआम हत्या कर रहे हैं—वह भी पूरी बेखौफी और बिना किसी जवाबदेही के.
इसके अलावा, इज़रायली सेना ने कब्जाधीन वेस्ट बैंक में व्यापक चेकपॉइंट स्थापित किए हैं, जहां फ़िलिस्तीनियों को डराने-धमकाने और प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है. यह सामूहिक प्रतिशोध की रणनीति 19 जनवरी को इज़रायल द्वारा अवैध रूप से कैद और अगवा किए गए फ़िलिस्तीनी कैदियों की रिहाई पर लोगों द्वारा जताई गई खुशी और जश्न को कुचलने के लिए अपनाई गई है.
इस पूरी कार्रवाई का मकसद साफ है: फ़िलिस्तीनी इलाकों की आबादी को खाली करना और भविष्य में अधिक से अधिक इलाकों पर कब्जा करने का रास्ता साफ करना.
जैसे ही वेस्ट बैंक में इज़रायल का नरसंहारक युद्ध तेज हो रहा है, एक और पहलू उभर कर आया है, जो बेहद चिंताजनक है और जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं—महमूद अब्बास के नेतृत्व वाले फ़िलिस्तीनी प्राधिकरण (पीए) की साफ़ तौर पर दिखने वाली चुप्पी. पीए सुरक्षा बलों और इज़रायली सेना के बीच तालमेल अब भी जारी है, भले ही फ़िलिस्तीनियों का क़त्ल-ए-आम किया जा रहा हो.
दिसंबर 2024 में, अब्बास की सेनाओं ने भी जेनिन कैंप पर बड़े पैमाने पर घेराबंदी और हमला किया था.
गाज़ा और वेस्ट बैंक में इज़रायल की कार्रवाइयाँ साम्राज्यवादी ताकतों, विशेष रूप से अमेरिका के निरंतर समर्थन और सांठगांठ से ही संभव हो रही हैं. अमेरिका हर साल इज़रायल को अरबों डॉलर की सैन्य सहायता देता है. यूरोपीय सरकारें, जो कभी-कभी हल्की-फुल्की निंदा करती हैं, इज़रायल को हथियारों की आपूर्ति जारी रखती हैं और उसे किसी भी अपराध की जवाबदेही से बचाती हैं.
भारत में, गाज़ा में इज़रायल के नरसंहार पर मोदी सरकार की चुप्पी न केवल एक कूटनीतिक विफलता है, बल्कि यह हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े बुनियादी ऐतिहासिक मूल्यों के साथ गहरा विश्वासघात भी है. यह बेहद जरूरी है कि भारत के लोग फ़िलिस्तीन के साथ अपनी ऐतिहासिक एकजुटता को फिर से मज़बूत करें.
जब दुनिया कुछ पल के लिए अपनी सांसें थामे हुए है, सच्चाई अभी भी यही है कि प्रतिक्रियावादी नेतन्याहू शासन के नेतृत्व में इजरायली सेटलर उपनिवेशवादी इस युद्धविराम को अस्थिर करने और फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए किसी भी वास्तविक शांति या न्याय को रोकने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे. यह युद्धविराम अंत नहीं है, बल्कि फ़िलिस्तीन की स्वतंत्रता के बड़े लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.
इज़रायल के नरसंहारी इरादे चाहे कहीं भी हों, फ़िलिस्तीन का जज़्बा और हौसला आज भी बरकरार है. गाज़ा और वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनियों का साथ देना, उनकी आवाज़ को बुलंद करना, और कब्जे, रंगभेद, और नरसंहार को समाप्त करने की मांग करना हम सभी की ज़िम्मेदारी है. यह संघर्ष केवल फ़िलिस्तीनियों का नहीं, बल्कि दुनिया के हर शोषित और पीड़ित इंसान का है.
(एमएल अपडेट, वॉल्यूम 28, अंक 04)