बांग्लादेश में छात्र विप्लव

बांग्लादेश में ऐतिहासिक छात्र उभार दिख रहा है. इस विक्षोभ को जन्म तो दिया उच्च न्यायालय के फैसले ने जिसके जरिये सरकारी नौकरियों में पुरानी कोटा प्रणाली फिर से बहाल की गई है, किंतु राज्य आतंक और गैर-न्यायिक हिंसा के जरिये आन्दोलन का दमन करने के सरकारी प्रयासों ने इस आन्दोलन को उग्र कर दिया और इसे दावानल की भांति बांग्लादेश के विश्वविद्यालय कैंपसों में तथा जिला मुख्यालयों में फैला दिया. यह साफ दिख रहा है कि इस आन्दोलन की लहर छात्र समुदाय और कोटा के मुद्दे से परे व्यापक जनता के बीच पहुंच रही है और लोकतंत्र तथा बदलाव की गहरी आकांक्षा को जन्म दे रही है.

उप-चुनाव के नतीजे और आगे की चुनौतियां

लोकसभा चुनाव के कुछ सप्ताह बाद ही तेरह विधानसभा सीटों के लिए उप-चुनाव हुए और भाजपा इनमें से केवल दो सीटों पर काफी कम मतों के अंतर से जीत पाई. उप-चुनाव के ये नतीजे यकीनन 2024 के जनादेश की ही संपुष्टि करते हैं. इन नतीजों का महत्व इस दृष्टिकोण से भी बढ़ जाता है कि मोदी शासन इस जनादेश की भावना को उद्दंडतापूर्वक खारिज कर रहा है जैसा कि सरकार के रवैये और घोषणाओं तथा जनता को डराने-धमकाने के लिए हो रहे माॅब लिंचिंग और बुलडोजर विध्वंस की ताजातरीन घटनाओं से परिलक्षित हो रहा है.

दो चुनावों की कहानीः फासीवादी दमन रोकने के लिए फ्रांस की जनता को बधाई!

अप्रैल और मई 2024 में भारत के सामने एक चुनौती थी और पूरी दुनिया इस पर नजर रखे हुए थी. 4 जून को जब भाजपा का रथ 240 पर रूका तो पूरी दुनिया में लोकतंत्र समर्थकों ने राहत की सांस ली. हालांकि, जैसे ही भारत ने फासीवादी ताकतों को आंशिक रूप से पीछे धकेल दिया, यूरोपीय संसद के चुनावों में पूरे महाद्वीप में जेनोफोबिक अति दक्षिणपंथी पार्टियों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गयी. जर्मनी में एएफडी, फ्रांस में आरएन, सत्तारूढ़ ब्रदर्स ऑफ इटली और यूरोप भर में अन्य अति दक्षिणपंथी पार्टियों ने जून की शुरूआत में यूरोपीय चुनावों में महत्वपूर्ण जीत हासिल की.

मोदी आपदा का अंत करने के लिए हर जुमले को खारिज करें ! हर तिकड़म को नाकाम करें और हर वोट को अहमियत दें !

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले कई अहम राजनीतिक घटनाक्रम उभर कर आए हैं.  सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड की बिक्री और भुगतान के डेटा मुहैया कराने के लिए भारतीय स्टेट बैंक के ज्यादा समय मांगने की अर्जी को खारिज कर दिया है. ज्यादा वक्त की मांग लोकसभा चुनाव के पहले डेटा का खुलासा न करने की मोदी सरकार और एसबीआई की मंशा और उनकी हताश कोशिशें नाकाम हो चुकी है. अब भारत निर्वाचन आयोग से यह उम्मीद की जाती है कि वह इस जानकारी को सार्वजनिक करे.