वर्ष - 32
अंक - 24
10-06-2023

एनसीआरबी द्वारा प्रकाशित आंकड़े (2021) आत्महत्या की खतरनाक ढंग से बढ़ती प्रवृत्ति को दिखा रहे हैं. मरने वालों में सबसे अधिक तादाद दैनिक मजदूरी कमाने वालों की है. कृषि क्षेत्र में खेत मजदूर सबसे ज्यादा मर रहे हैं. छात्रों का स्थान छठा है, जबकि गृहणियां दूसरे स्थान पर हैं. मौत को गले लगाने वालों की सूची में बेरोजगारों का नंबर दूसरा है. 64.2 प्रतिशत आत्महत्या करने वाले लोगों की आमदनी 1 लाख रुपये सालाना से कम है, जबकि 31.6 प्रतिशत लोगों की सालाना आय एक से पांच लाख रुपये के बीच है. क्या हमें इस बात पर हैरत हो रही है कि पूंजीवाद लोगों को मार रहा है ?

पूंजीवाद के समर्थक तो दावा करते हैं कि पूंजी का मूल्यवर्धन होने से अभूतपूर्व मात्रा में धन पैदा होगा, और वह धन रिसते हुए मेहनतकश अवाम तक पहुंचेगा. अगर ऐसा है, तो धन के असली सृजनहार आज क्यों ऐसी कठिनाई झेल रहे हैं ? मार्क्स ने दिखया है कि प्रकृति और श्रम पूंजीवाद के लिए धन पैदा करने वाले दो स्रोत हैं. उन्नीसवीं सदी में हम नवजात पूंजीवाद की दुरवस्था और घिनौनेपन तथा शहरों के जमावड़े की कल्पना कर सकते हैं, जो शुरूआती पूंजीवाद के लक्षण थे. लेकिन इक्कीसवीं सदी में, और खासकर ‘नए भारत’ में, हम इस किस्म की लूट-खसोट क्यों देख रहे हैं ? क्या इसका जवाब खुद पूंजी संचय की प्रक्रिया में ही निहित है ? हम इस सवाल का जवाब दो खंडों में देंगे – पहले खंड में हम रोजाना कमाने वाले (कृषि व गैर-कृषि) मजदूरों को, और दूसरे खंड में छात्रों व तदर्थ शिक्षकों को अपने विश्लेषण के आधार के बतौर लेंगे.

दोनों जोड़ियों (अर्थात् कृषि व गैर-कृषि दैनिक मजदूर, तथा छात्रा व तदर्थ शिक्षक) का चुनाव खुद एक व्याख्या का प्रमाण दे देंगे. हर जोड़ी अलग-अलग किस्म के रूपांतरण को दिखाता है – गैर-कृषि मजदूर खेतिहर काम से बाहर निकले हैं, और तदर्थ शिक्षक छात्र समुदाय से. कुछ कृषि मजदूर बेहतर मजदूरी के लिए गैर-कृषीय कार्यों की ओर पलायित होते हैं, और शिक्षक बनने से पहले वे छात्र ही हुआ करते हैं. कम आमदनी वाले कृषि कार्य से बेहतर आमदनी वाले गैर-कृषि कार्यों की ओर पलायन पूंजीवादी रूपांतरण की आधार-शिला होता है – और इसी आकांक्षा पर पूंजीवाद फूलता-फलता है. ठीक उसी तरह शिक्षा हासिल कर बेहतर जिंदगी की आकांक्षा छात्रों व शिक्षकों के अंदर भी होती है. मार्क्स ने इसी आकांक्षा का इस्तेमाल इस बात की व्याख्या करने के लिए किया कि कैसे पूंजीवादी संचय, और खासकर दिहाड़ी श्रम, अस्तित्व में आया. तार्किक रूप से, पूंजीवादी संचय तभी आगे बढ़ सकता है, जब अतिरिक्त मूल्य पैदा हो; लेकिन अतिरिक्त मूल्य के लिए पूर्वशर्त यह है कि उत्पादन का स्वरूप पूंजीवादी बन चुका हो, और इसके लिए शर्त यह है कि माल उत्पादकों के पास श्रम शक्ति का भंडार और पूंजी मौजूद हो. दिहाड़ी श्रम, अर्थात् ऐसा श्रम जो मजदूरी के लिए श्रम शक्ति बेचने को बाध्य हो, के लिए वैसे लोगों की जरूरत होगी जो उत्पादन के साधनों के साथ बंधन से पूरी तरह मुक्त किए जा चुके हों (अर्थात्, जैसा कि मार्क्स ने कहा, वे “न तो उत्पादन के साधन के अंग होंगे और न ही उनके पास उत्पादन के साधन होंगे”.

अब, मेहनतकश लोग मजदूरी के लिए काम करने के रास्ते पर ही चल रहे हैं. पूंजीवाद के अन्याय का बोझ घरेलू महिलाओं को उठाना पड़ता है जो काम तो करती हैं, लेकिन उनकी श्रम शक्ति की कोई कीमत उन्हें नहीं मिलती. इस अन्याय का दंश बेरोजगारों को भी झेलना पड़ता है जो अपनी श्रम शक्ति बेचना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें इसको खरीदने वाला नहीं मिलता है. अलबत्ता, बेरोजगारों की उपस्थिति रोजगार में लगे लोगों को तलवार की धर पर रखती है – बमुश्किल रोजगार पाए लोगों के पीछे बेरोजगारों की विशाल फौज खड़ी रहती है जिसके चलते वे सस्ती कीमत पर अपनी श्रम शक्ति बेचने को बाध्य होते हैं. आज के दैनिक मजदूर कल बेरोजगार हो जा सकते हैं, और आज के बेरोजगार कल के दैनिक मजदूर. यह परिस्थिति और भी दुश्वार हो जाती है, जब मजदूर अपनी जिंदगी ठीक से चलाने लायक कमा भी नहीं पाते हैं. इस प्रकार, अनुबंध की अनिश्चयता और पर्याप्त कमा पाने की असमर्थता मेहनतकशों को अपने श्रम की कमाई का आनंद नहीं लेने देती है. उनका निकला पसीना उन्हें जीवन के पर्याप्त साधन नहीं दे पाता है. नए भारत में राज्य समय-समय पर व्यवस्था पर आघात पहुंचा कर इस दुश्वारी को सुनिश्चित कर देता है. 2016 में गलत मंशा से की गई नोटबंदी जिसने गरीबों से उनकी बची-खुची आमदनी छीन ली, फिर जीसटी प्रणाली जिसने माल बेचने वालों से उनकी छोटी-मोटी बचत हड़प ली, फिर डिजिटल भुगतान प्रणाली जिसने गरीबों को उनकी गाढ़ी नगदी कमाई से वंचित कर दिया. और फिर 2020 में किसी पूर्वसूचना व तैयारी के बगैर आया दानवी लाॅकडाउन जिसने दसियों लाख लोगों के आजीविका-अवसरों पर सांघातिक प्रहार किया. न्यूनतम मजदूरी कानून ऐसा विधई कानून है जो 1948 में लागू होने के बावजूद क्रियान्वयन के मामले में सबसे उपेक्षित रहा है.

अगर इस कहानी – चाहे वह आम तौर पर वैश्विक पूंजीवाद हो, अथवा खास तौर पर भारतीय परिघटना – कोे संपूर्णता में देखा जाए तो श्रम का समूचा जीवन चक्र ही दुश्वारियों में घिरा पाया जाएगा. कृषि कार्य में भूमिहीनता और निम्न मजदूरी दिखती है, और अगर कोई गैर-कृषि कार्य की ओर जाता है तो उसकी दशा भी बहुत भिन्न नहीं मिलेगी. यहां तक कि वेतनभोगी और स्व-नियोजित लोग भी दुश्वारी की इस घेरेबंदी से बाहर नहीं हैं. अगर सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी उपभोग सामग्रियों पर आम सब्सिडी जैसे कदम उठाती भी है, तो बारंबार यह प्रयास किया जाता है कि इसे कुछ खास समूहों तक ही सीमित बना दिया जाए. चक्रीय बेरोजगारी की समस्या के निदान के लिए अपनाए गए ‘मनरेगा’ जैसे कार्यक्रमों के लिए भी सरकार की ओर से फंड में कटौती कर दी जाती है, अथवा डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करके गरीबों को उनकी गाढ़ी कमाई पाने में मुश्किलों में डाल दिया जाता है. और इन सबसे ऊपर, जमीन से बेदखली तथा सरकार के करीबी काॅरपोरेटों के हाथों प्राकृतिक संसाधनों को सौंप देने से अधिसंख्य लोगों के लिए दुश्वारी का यह चक्र और बड़ा हो जाता है. पूंजीवाद के अंतर्गत श्रम का जीवन चक्र ऐसी अनेक अनिश्चयताओं से भरा होता है. क्या यह देख पाना मुश्किल है कि दैनिक मजदूरों, बेरोजगारों, खेतिहर मजदूरों, वेतनभोगी पेशाकर्मियों, स्वनियोजितों, छात्रों और घरेलू महिलाओं की जिंदगी को कौन तबाह कर रहा है? प्रख्यात अर्थशास्त्री जाॅन राॅबिन्सन की एक उक्ति बारंबार उद्धृत की जाती है कि पूंजीवाद के द्वारा शाषित होने से भी बदतर बात है उसके द्वारा शोषित न होना. दूसरे शब्दों में, बेरोजगार होना पूंजीवाद के अंतर्गत रोजगार में रहने से भी बदतर बात है. लेकिन अगर पूंजीवाद लोगों को मारता है, तो शोषित होने और न होने के बीच की सीमारेखा बिल्कुल शाब्दिक रूप से जीवन और मौत का मामला है.

– केबी