वर्ष - 31
अंक - 40
01-10-2022

क्या वाकई नागरिक अधिकार के दायरे से अब भी एक वर्ग दूर है?

विगत 28 सितंबर 2022 को, शहीद भगत सिंह जयंती पर प्रेमचंद रंगशाला में हिरावल द्वारा ‘वेटिंग फॉर वीजा’ नाटक का मंचन किया गया. दरअसल यह डॉ. बीआर अंबेडकर की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘वेटिंग फॉर वीजा’ का संतोष झा द्वारा किया गया नाट्य रूपांतरण है.

जिस तरह सरकार संविधान के प्रति उदासीन है, उसकी रुचि लोक कल्याण से अधिक भ्रांति फैलाकर आपसी मतभेद बढ़ाने की है, उस वक्त जब संविधान को हर हाल में बचा लेना आज की बड़ी चुनौती है. ‘वेटिंग फॉर वीजा’ आज भी प्रासंगिक है. आज भी अस्पृश्यता की समस्या खत्म नहीं हुई है. अंबेडकर जैसे सशक्त और प्रखर विद्वान को भी छुआछूत और भेदभाव जैसी घिनौनी प्रथा से गुजरना पड़ा था.

नाटक में उनके ही जीवन की तीन घटनाओं को कलाकारों ने बेहद संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है. इस नाटक के जरिए निर्देशक संतोष झा ने तीन जरूरी कविताओं का बेहद सार्थक और मर्मबेधक संयोजन किया है. अंतिम दृश्य दर्शकों को सिर्फ मर्माहत ही नहीं करता बल्कि कई सवाल भी खड़े करता है. एक अहम सवाल यह है कि क्या वाकई नागरिक अधिकार के दायरे से अब भी एक वर्ग दूर है.

इस नाटक की की बेहद सफल प्रस्तुति में अभिनेताओं के रूप में जिन्होंने छाप छोड़ी उनमें संजय किशोर (बुजुर्ग अंबेडकर व सूत्रधार), मृत्युंजय प्रसाद व संजीव कुमार, (युवा अंबेडकर), विवान सिद्द (बाल अंबेडकर), प्रीति प्रभा (काकी), जसीम अकरम (बड़ा भाई), विशाल )छोटा भाई), शफा बारी )पारसी 1), बलवंत सिंह बल्लू (पारसी 2), प्रवीण कुमार (तांगा वाला), प्रभाकर सिंह (माधव), सराय का संजीव कुमार सिंह (मैनेजर), रवि राज नारायण (चुंगी वाला), रवि कुमार (हवलदार), शिवांग (स्टेशन मास्टर) प्रमुख रहे. इस प्रस्तुति के पार्श्व में रौशन, (लाइट), जितेंद्र कुमार जीतू (मेकअप), सत्यम (पार्श्व संगीत), रवि राज नारायण (प्रापर्टी), मृत्युंजय प्रसाद (साज सज्जा), प्रकाश कुमार (रिहर्सल), राजेश कमल व राम कुमार (प्रोडक्शन) की भूमिका भी उल्लेखनीय है. वेटिंग फॉर वीजा के निर्देशक के बतौर संतोष झा ने अपनी सधी हुई परिकल्पना से पटना के रंग दर्शकों को एक बार फिर से अभिभूत कर दिया.

performance of Waiting for Visa raised questions

मंचीय दस्तावेज बन गई यह प्रस्तुति

कल प्रेमचंद रंगशाला, पटना में नाटक ‘वेटिंग फॉर वीजा’ से गुजरने का अवसर मिला. ... मैं इस ‘नाटक को देखन’ के बजाये ‘नाटक से गुजरने’ की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाटक आपको जितना दिखाई देता है, उससे कहीं गहरे आपको अपने अंदर महसूस होता है.
नाटक के साधारण दिखने वाले दृश्यों ने जिस तरह से अपना प्रभाव दर्शकों पर छोड़ा उसका अंदाजा अंत तक दर्शकों से खचाखच भरे ऑडिटोरियम से आप लगा सकते थे. करीब दर्जन भर नये अभिनेताओं के साथ तैयार की गई यह प्रस्तुति हमको हमारे आसपास के माहौल में वापस ले जाती है. नाटक देखने के समय आपको यह महसूस होता है कि यह सब तो अब भी आपके आसपास घटित हो रहा है, और कहीं ना कहीं आप ऐसी घटनाओं के बिल्कुल पास से गुजरे हैं. दृश्यों को बहुत ही साधारण तरह से बनाया गया है और बेहद ही सरल से दिखने वाले दृश्य अपने कंटेंट के कारण आपको अपने से जोड़े रखते हैं. निर्देशक ने बेहद ही जरूरी दृश्यों का चयन किया, संभव है इस चुनाव के पीछे उनकी अपनी सामाजिक समझ रही होगी और इसके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं. नाटक के अंदर कविताओं को बड़े ही साधारण तरीके से जोड़ा गया है लेकिन वे नाटक की धार को पैनापन देकर और भी प्रभावशाली बना देती हैं. नाटक के दृश्यों के बीच प्रयोग किये गये बिट्स दृश्यों के अंदर के द्वंद्व को बेहद ही प्रभावशाली तरीके से उभारने में सक्षम थे.
एक सबसे जरूरी बात जो मैं यहां उल्लेखित करना चाहता हूं वो यह कि अभिनेता, खासतौर से नए अभिनेता साहित्य और भाषा से बहुत ही कटते जा रहे हैं. नये साथी अगर साहित्य से दोस्ती कर लें तो उनके अभिनय में एक अलग तरह का निखार आ जायेगा.
नाटक का विद्यार्थी होने के नाते मेरे लिए यह सुखद अनुभव रहा कि नाटक के बाद दर्शक नाटक के दृश्यविन्यास, वस्त्र सज्जा, प्रकाश परिकल्पना पर नहीं बल्कि नाटक के कंटेंट पर बात कर रहे थे, मुझे लगता है कि यही नाटक की सफलता का संकेत है. आशा है कि नाटक अपने दूसरे, तीसरे मंचन तक आते-आते पूरी तरह से निखर जायेगा.
यह नाटक शोर-शराबा और एक खास तरह के मनोरंजन के बोझ से मुक्त है और बड़ी मुखरता से डॉ. अंबेडकर की वेदना और विमर्श को दर्शकों तक संप्रेषित करता है. ऐसे मंचन एक तरह से मंचीय दस्तावेज की तरह होते हैं जिन्हें देखकर मूल रचना को पढ़ने का मन होता है.
– जहांगीर के

सुधि दर्शकों ने कहा

  • हॉल भरा था. लोग खड़े थे. जगह न मिलने की वजह से बहुत से लोग चले गए. – अरविंद पासवान, युवा कवि
  • कमाल का नाटक था. क्या लिखूं? तारीफ करने के लिए शब्द कम पड़ रहे हैं. अभिभूत हूं. – दिवाकर घोष, रंगकर्मी
  • बहुत शानदार रहा. जन जागरूकता का बेहतर प्रयास. बधाई! – सत्येंद्र कुमार, कवि
  • अभिनय और प्रस्तुति बहुत अच्छी रही. – संतोष दीक्षित, चर्चित कथाकार
  • भगत सिंह के जन्मदिन पर एक अनूठी प्रस्तुति. आपको और आपकी पूरी टीम को बधाई! – अरुण जी, शिक्षक
  • बहुत सशक्त प्रस्तुति था, कथ्य की अपनी खासियत तो रही ही, पूरी टीम को मेरी बधाई, खासकर संतोष झा को. – यादवेन्द्र, लेखक व वैज्ञानिक
  • शानदार परिकल्पना, शानदार अभिनय और सबसे शानदार निर्देशन. दलित कविताओं को जिसतरह मंच पर प्रस्तुत किया गया, वह अद्भुत था. पूरी टीम को बधाई. नाटक अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल रहा. – सुनील श्रीवास्तव, युवा कवि
  • वाह! भीड़ देखकर मन गद्गद हो गया. पटना में होता तो मैं भी उस भीड़ का हिस्सा बनता. – हेमंत कुमार, पत्रकार
  • बिहार में अंबेडकर के इस आत्मकथ्य की प्रस्तुति पहली बार हुई है. संभव है भारत की ही हिंदी में यह पहली प्रस्तुति हुई हो. – मुसाफिर बैठा, कवि