दिल्ली चुनाव 2020 का जनादेश : मोदी शाह सरकार को बेहद जरूरी करारी चोट

दिल्ली को जीतने के लिये अत्यंत विद्वेषपूर्ण अंदाज में चलाये गये भाजपा के चुनाव प्रचार के बाद अब हमारे सामने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गये हैं, और यह लगभग 2015 के चुनाव नतीजों को दुहराने जैसा ही है. आम आदमी पार्टी (आप) ने 2015 के चुनाव में हासिल 50 प्रतिशत से ज्यादा वोटों को कमोबेश इस बार भी बरकरार रखा है, हालांकि उसे प्राप्त सीटों की संख्या 67 से थोड़ा घटकर 62 हो गई है. जिन सीटों पर आप को पराजय देखनी पड़ी वे भाजपा की झोली में गई हैं, परिणामतः भाजपा को प्राप्त सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 8 हो गई है.

शाहीनबाग के पक्ष में खड़े हों : दिल्ली में भाजपा के साम्प्रदायिक प्रचार अभियान को परास्त करें

दिल्ली भारत की राजधानी है, सत्ता की राजगद्दी है, जहां सत्ता पर काबिज लोगों ने एक भेदभावमूलक, विभाजनकारी और विध्वंसकारी सीएए-एनआरसी-एनपीआर परियोजना के जरिये देश के संविधान के खिलाफ जंग छेड़ दी है. इसी दिल्ली में देश का सर्वोच्च न्यायालय भी स्थित है जहां इस अनिष्टकारी साजिश के खिलाफ की गई अपील जारी है.

भाजपा के पास दिल्ली के मतदाताओं को देने के लिये है सिर्फ साम्प्रदायिक और सत्ताधिकारवादी जहर

पांच साल पहले गणतंत्र दिवस पर, दिल्ली विधनसभा के पिछले चुनाव की पूर्ववेला में प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को अपना अतिथि और दोस्त बताकर शेखी बघारी थी और दस लाख रुपये का सूट पहनकर नुमाइश की थी, जिस समूचे सूट पर उनका नाम काढ़ा हुआ था. वर्ष 2020 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर नरेन्द्र मोदी के अतिथि थे ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो, जो अपनी नस्लवादी, महिला-विरोधी और समलैंगिकता-विरोधी नफरत भरे भाषणों के लिये, सैनिक तानाशाही और जनसंहारों का महिमा-मंडन करने तथा अमेजन के बरसाती जंगलों की विशाल पट्टियों का विनाश करने के लिये कुख्यात हैं.

गणतंत्र दिवस 2020: गणतंत्र के सबसे बड़े संकट ने सबसे जीवंत प्रतिरोध को जन्म दिया है

गणतंत्र दिवस 2020 भारतीय गणतंत्र और जिस संविधान ने गणतंत्र की घोषणा की, उसकी 70वीं वर्षगांठ है. इन सत्तर वर्षों में हमारे गणतंत्र ने कभी इतनी ज्यादा गंभीर आंतरिक चुनौती का सामना नहीं किया जितना कि उसे आज उसी कार्यपालिका के हाथों झेलनी पड़ रही है, जिसको संविधान के मुताबिक कानून का शासन प्रदान करने की शक्तियां और जिम्मेवारी सौंपी गई है. आज संविधान का बुनियादी चरित्र ही हमले का शिकार बन गया है.

बेलूर मठ में मोदी: एक परेशान तानाशाह ने खुद अपना भांडा फोड़ा

12 जनवरी स्वामी विवेकानंद की जन्मवार्षिकी है. सन् 1984 से इसी दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है.  हताशा से बेताब नरेन्द्र मोदी ने इस दिन को भी हथियाने की कोशिश में कोलकाता के नजदीक स्थित बेलूर मठ का दौरा किया, जहां रामकृष्ण मठ और मिशन का मुख्यालय स्थित है. वहां जाकर मोदी ने भारतीय नागरिकता कानून में किये गये सम्पूर्णतः असंवैधानिक और विभाजनकारी संशोधन के पक्ष में भाषण दिया. उनके भाषण में वह सारी ड्रामेबाजी और जुमलेबाजी मौजूद थी जिसका इस्तेमाल आम तौर पर मोदी अपनी चुनावी रैलियों में करते हैं, हालांकि यहां उसका पैमाना थोड़ा घटा हुआ था.

गुंडों के द्वारा, गुंडों के लिए, गुंडों की सरकार

डंडों, लोहे की छड़ों और बड़े हथौड़ों से लैस नकाबपोश नौजवान लड़कों-लड़कियों के एक ग्रुप द्वारा जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों पर बर्बर हमले की तस्वीरों ने एक बार फिर भारत में बढ़ती फासीवादी हिंसा को समूची दुनिया के सामने उजागर कर दिया है. हिंसा की तीव्रता से कहीं ज्यादा इसके पूरे पैटने से मोदी शब्दावली ‘सब कुछ ठीक-ठाक है’ में अभी तक यकीन रखने वालों की आंखें खुल जानी चाहिए.

हम भारत के लोग सरकार चुनते हैं – सरकार कौन होती है कि वो लोगों को चुने ?

हमारे संविधान में इस बात की गारंटी की गई है कि भारत के लोग वोट देकर अपनी सरकार चुनें और उसे अपने हिसाब से चलायें. संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता कि सरकार तय करे कि देश में किन्हें वोट का हकदार माना जायेगा और किन्हें नहीं. हमारे संविधान की सर्वप्रथम लाइन है ‘हम भारत के लोग’ – ना कि ‘हम भारत के लोग जिनके पास ऐसे दस्तावेज हैं जिनसे साबित होता है कि हम भारत के हैं’ या कि ‘हम भारत की सरकारें जो कि यह तय करती हैं कि कौन लोग भारत के हैं’!

मोदी के फूट डालो, राज करो के खिलाफ हम एकजुट हो रहे हैं, प्रतिरोध कर रहे हैं !

साल 2019 खत्म होने जा रहा है, और भारत आज सचमुच एक दोराहे पर खड़ा है जहां एक रास्ता आरएसएस के हिंदू राष्ट्र के सपने की ओर जाता है, तो दूसरी राह हमें और भी ऊंचे दर्जे के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की तरफ ले जाने वाला है. दूसरी बार पुनः निर्वाचित होने के बाद मोदी साकार ने अभी-नहीं-तो-कभी-नहीं किस्म की उन्मादी उग्रता और हमलों के साथ आरएसएस के दीर्घकालिक एजेंडे के तमाम हथियारों का तेजी से इस्तेमाल शुरू कर दिया है.

विनाशकारी सीएबी-एनआरसी साजिश को नाकाम करो

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस से एक दिन पहले भारत की लोकसभा ने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी), 2019 को पारित कर दिया जो स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक के सर्वाधिक निरंकुश और भेदभावमूलक कानूनों में से एक है, जो भारत की नागरिकता की बुनियादी शर्तों को ही बदल देता है, और इसी वजह से भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे तथा भारतीय गणराज्य के मूलभूत चरित्र का उल्लंघन करता है; बस इसमें इतना ही बाकी है कि संविधान की प्रस्तावना में जो ‘धर्मनिरपेक्ष’ विशेषण जुड़ा हुआ है उसको जाहिरा तौर पर हटाया नहीं गया है.

अयोध्या पर फैसला: साम्प्रदायिक विध्वंसों को प्रोत्साहित किया जा रहा है

1949 में बाबरी मस्जिद के भीतर चोरी-छिपे ‘राम लला’ की मूर्ति रख दिये जाने को प्रस्थान-बिंदु बनाकर 1990 के दशक के एकदम शुरूआती वर्षों की राजनीति की रचना हुई थी, जिसके बाद एक हिंसक अभियान चला जिसका परिणाम भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के नेतृत्व में एक फासीवादी भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस में हुआ. इस अभियान के दौरान और मस्जिद के विध्वंस के तुरंत बाद समूचे उत्तर भारत में साम्प्रदायिक भीड़-गिरोहों द्वारा मुसलमानों का जनसंहार हुआ.