अमरीका में जारी नस्लवादी-विरोध की लहरें और भारत में उसकी अनुगूंज

अमरीका में आजकल संस्थागत नस्लवादी पक्षपात और पुलिस द्वारा बर्बर हिंसा के खिलाफ आंदोलन में बड़े पैमाने का उभार आया हुआ है. इस उभार का कारण बनी हाल की एक घटना, जिसमें मिनेपोलिस के श्वेत पुलिस अधिकारियों ने एक अफ्रीकी-अमरीकी अश्वेत पुरुष जार्ज फ्रलाॅयड को सड़क पर मुंह के बल लिटा दिया, और उनमें से एक पुलिस अधिकारी ने फ्रलाॅयड की गर्दन को अपने घुटने से दबाये रखा. तमाम लोगों के सामने उस पुलिसवाले ने फ्रलाॅयड का गला घोंटना जारी रखा जबकि फ्रलाॅयड लगातार चीख रहे थे कि उनका दम घुट रहा है और वे मर रहे हैं.

कार्ल मार्क्‍स का 202 वां जन्‍मदिन: कोविड-19 के संकट के बहाने तानाशाही और नियंत्रण की कोशिशों का विरोध करो! इस संकट को सामूहिक प्रतिरोध और सामाजिक बदलाव के अवसर में बदल दो!

मार्क्‍स पूरी तरह से क्रांतिकारी यथार्थवादी थे. उनके लिए बुनियादी पदार्थ ही यथार्थ था. गति पदार्थ के अस्तित्‍व का रूप है. उनके चिंतन की जड़ें ठोस सामाजिक यथार्थ में धंसी हुई थीं. लेकिन यथार्थ को स्‍वीकार करने का अर्थ यथास्थितिवाद को जायज ठहराना कतई नहीं था. उनके लिए यथार्थ को स्‍वीकार करने का मतलब सामाजिक यथार्थ में आमूल बदलाव और गुलामी से मुक्ति का हर संभव प्रयास करना था.

मई दिवस 2020: वैश्विक महामारी के दौर में अंतरराष्‍ट्रीय मजदूर दिवस

मई दिवस अंतरराष्‍ट्रीय मजदूर दिवस है. इसकी प्रेरणा एक दिन में काम के घंटे तय करने के उन्नीसवीं सदी में हुए पहले बड़े संघर्ष से मिली. इस संघर्ष की मांग थी कि एक दिन में काम के आठ घंटे तय किये जायें. आज भी मई दिवस काम के घंटों के बारे में है. खासकर भारत आज के संदर्भ में जहां कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच में सरकार एक दिन में काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 करने जा रही है. मई दिवस सभी मजदूरों के लिए वेतन के साथ छुट्टी के अधिकार के बारे में है. लेकिन भारत में तो करोड़ों मजदूर ऐसे हैं, जिन्‍हें मजदूर का दर्जा ही नहीं दिया गया.

कोरोना वायरस प्रकोप और लॉकडाउन के दौर में अम्बेडकर की याद

इस साल हम देशव्यापी लॉकडाउन के पहाड़ तले पिसते हुए हत्यारी वैश्विक महामारी की छाया में अम्बेडकर जयंती मना रहे हैं.

कोरोना के खिलाफ जंग को सशक्त करो जनता को आर्थिक राहत की फौरन गारंटी करो

अब हम देशव्यापी 21-दिवसीय लाॅकडाउन के तीसरे हफ्रते में प्रवेश कर चुके हैं. यह लाॅकडाउन ही कोरोना महामारी के खिलाफ मोदी सरकार का एकमंत्री निर्णायक और ठोस कदम रहा है और सरकार ने हर तरह से इसको लागू कराने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. भारत में इस महामारी की जिस दर से वृद्धि हो रही है और उसका फैलाव हुआ है उसे देखते हुए हम निश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि लाॅकडाउन अब तक किस हद तक सफल हुआ है.

कोरोना वायरस प्रकोप और लॉकडाउन के दौर में अम्बेडकर की याद

इस साल हम देशव्यापी लॉकडाउन के पहाड़ तले पिसते हुए हत्यारी वैश्विक महामारी की छाया में अम्बेडकर जयंती मना रहे हैं. हम इस दौर में भौतिक रूप से इकट्ठा नहीं हो सकते पर हमेशा की तरह हम उनके मुक्तिकामी संघर्ष, विचारों और विरासत से प्रेरणा हासिल कर सकते हैं. उनका ‘शिक्षा, संघर्ष और संगठन’ का ध्येय इस भीषण संकट में हमें ताक़त देगा. अस्पृश्यता के खिलाफ उनका संघर्ष और जाति के समूल नाश का उनका महाघोष हमें कोरोना विषाणु के साथ जुड़े दमन और अन्याय के सामाजिक विषाणु से लड़ने के लिए ऊर्जा देगा.

लाॅकडाउन का मिलकर मुकाबला करो! कोरोना को रोको, भुखमरी से लड़ो, जनता की सेवा करो!

कोरोना संक्रमण और उससे हुई मौतों के तेजी से बढ़ते मामलों की खबरों के बीच हम 24 मार्च की शाम को प्रधान मंत्री द्वारा घोषित 21-दिवसीय लाॅकडाउन के दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुके हैं.

यस बैंक का विध्वंस: मोदी के आर्थिक कुप्रबंधन का तांडव जारी है

एक दूसरा बैंक मोदी शासन में ध्वस्त हो गया. यस बैक को रिजर्व बैंक ने बीमार और अक्षम घोषित कर दिया है; जो एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ, एक्सिस बैक और कोटक महिंद्रा के बाद पांचवा नवीनतम इस किस्म का बैंक है. जहां वित्त मंत्री पैसा जमा करने वालों को आश्वस्त कर रही हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है, वहीं रिजर्व बैक ने इस बैंक से पैसा निकालने की सीमाबंदी कर दी है जिसके चलते सभी खाताधारकों को फौरन नगदी की जरूरत के समय भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. यस बैंक का यह विध्वंस पंजाब और महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंकों में इसी किस्म के संकट के ठीक बाद सामने आया है.

अमित शाह को इस्तीफा देना होगा

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गिरोहबंद भीड़ द्वारा मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा में दिल्ली पुलिस की सांठगांठ के बारे में एक के बाद सबूत सामने आते जा रहे हैं.

दिल्ली में शांति बहाल करो! दंगा भड़काने वालों को सजा दो! असुरक्षित लोगों के जीवन और अधिकारों की रक्षा करो!

जहां मोदी-शाह सरकार अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मेजबानी करने में व्यस्त थी, वहीं राजधानी दिल्ली मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर छेड़े गये दंगों की आग में झुलस रही थी, जिसे भाजपा के नेताओं के एक समूह ने सुलगाया और भड़काया था. दिल्ली पुलिस ने अगर कहीं इस दंगे में खुलकर हिस्सा नहीं लिया तो कम से कम मूक दर्शक बनी तो जरूर खड़ी रही. चार दिनों तक लगातार चले इस दंगे ने अब तक तीस से अधिक लोगों की जान ले ली है. इससे कहीं ज्यादा संख्या में लोग संगीन तौर पर घायल पड़े हैं और सैकड़ों लोगों को अपना घर जला दिये जाने के चलते विस्थापित होना पड़ा है और उनकी आजीविका नष्ट हो गई है.