वर्ष - 28
अंक - 49
23-11-2019

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रों के जोशीले संघर्ष ने शिक्षा के अधिकार के मुद्दे को राजनीति के केन्द्रीय मंच पर ला दिया है.

दिल्ली में जेएनयू भारत के ऐसे मुठ्ठी-भर संस्थानों में से एक है जहां गरीबों की संतानें भी विश्वविद्यालय की सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त करने की हैसियत रखती हैं. अब मोदी सरकार द्वारा नियुक्त जेएनयू के वाइस चांसलर ने होस्टल के कमरों का किराया बढ़ाने तथा छात्रों से काफी बढ़ाचढ़ाकर सेवा शुल्क, और पानी तथा बिजली का बिल अदा करने की मांग करते हुए होस्टल की सुविधाओं का बाजारीकरण करने के जरिये इस विश्वविद्यालय के दरवाजे गरीबों के लिये बंद कर देने की कोशिश की है.

जेएनयू की लम्बे अरसे की प्रवेश-नीति के चलते, जिसमें गरीबों और हाशिये पर खड़े लोगों का स्वागत किया जाता है, छात्रों में 40 फीसदी ऐसे परिवारों से आते हैं जिनकी मासिक पारिवारिक आय 12,000 रुपये से कम है. फीस और सेवा शुल्कों में इतनी ऊंची बढ़ोत्तरी के कारण अब ऐसे परिवारों को अपनी समूची आय से भी ज्यादा राशि अपने बेटे या बेटी को विश्वविद्यालय में बरकरार रखने के लिये होस्टल फीस की एवज में खर्च कर देनी होगी! और जेएनयू की प्रवेश नीति के चलते ही जेएनयू में पढ़ने वालों में आधे से ज्यादा संख्या छात्राओं की है, फीस में बढ़ोत्तरी और होस्टलों का बाजारीकरण उनको भी विश्वविद्यालय से निकाल बाहर करेगा.

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जेएनयू के छात्र केवल अपने लिये नहीं संघर्ष कर रहे हैं. अगर जेएनयू में, जहां का छात्र आंदोलन इतना शक्तिशाली है, होस्टलों का सफलतापूर्वक बाजारीकरण कर दिया गया, तो अन्य कालेजों एवं विश्वविद्यालयों में भी, जहां फीस कम है (जिनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी, हैदराबाद सेन्ट्रल युनिवर्सिटी भी शामिल हैं) छात्रों को जल्द ही इसी समस्या का सामना करना होगा. ये छात्र इस बात को सुनिश्चित करने के लिये लड़ रहे हैं कि काॅलेज और विश्वविद्यालय की शिक्षा हासिल करना हर भारतीय का अधिकार है, अमीरों के लिये सुरक्षित विशेषाधिकार नहीं.

मोदी सरकार ने जेएनयू के छात्रों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है – उसने सीआरपीएफ जैसे अर्ध-सैनिक बलों की टुकड़ियों को कैम्पस में घुसने की आजादी दे दी है और जब-जब जेएनयू के छात्रों ने दिल्ली की सड़कों पर अपनी आवाज उठाने की कोशिश की है तो उन पर पुलिस ने भयानक लाठीचार्ज किया है. दिल्ली पुलिस ने, जो सीधे केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह का हुक्मबरदार है, सड़कों की बत्तियां गैर-कानूनी ढंग से बुझा दीं और अंधेरे की चादर में छात्रों को बड़ी बर्बरता से पीटा. एक दृष्टिबाधित छात्र को धक्का देकर सड़क पर गिरा दिया गया और पुलिस ने अपने बूटों की ठोकरों से मारा. छात्राओं को यौन-हिंसा का निशाना बनाया गया.

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मगर इस हिंसा से विचलित हुए बिना जेएनयू के छात्र अपना आंदोलन जारी रखे हुए हैं. और वे विचारों के युद्ध में भी जीत हासिल कर रहे हैं. संघ की प्रचार मशीनरी, जिसमें प्रमुख टीवी चैनलें शामिल हैं, जेएनयू की परियोजना को करदाताओं के पैसे की बरबादी तथा जेएनयू के छात्रों को मुफ्तखोरों की जमात बता रहे हैं. जेएनयू की छात्राओं को अत्यधिक महिला-विद्वेषी निंदक शब्दों में निशाना बनाते समय तो यह प्रचार भौंड़ेपन की चरम सीमा पर पहुंच जाता है. मगर सच्चाई यह है कि जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों ने इस झूठ के कोलाहल को पछाड़ते हुए लोगों को सच्चाई बता दी है. अब यह व्यापक रूप से माना जाता है कि यह लड़ाई गरीबों के हित में लड़ी जा रही है ताकि वे अपने बच्चों को विश्वविद्यालय भेज सकें. करदाता नागरिक मांग कर रहे हैं कि जो सरकार उच्च शिक्षा पर खर्च करने की बात आने पर फंड की कमी का रोना रो रही है, उसने शिक्षा की मद में सेस से बटोरी लगभग 100 करोड़ रुपये की राशि को खर्च किये बिना अनछुआ क्यों छोड़ दिया? वे यह भी पूछ रहे हैं कि क्यों हर साल कारपोरेट कम्पनियों को लाखों-करोड़ों रुपये का कर माफ कर दिया जाता है, जिसे अगर संचित किया जाता तो सैकड़ों नये विश्वविद्यालय खोले जा सकते थे.

जेएनयू के छात्रों ने फीस में “बढ़ोत्तरी वापस लिये जाने” और “बीपीएल छात्रों को छूट” की धोखाधड़ी की भी पोल खोल दी है. वास्तव में, तथाकथित “बढ़ोत्तरी वापस लिया जाना” और छूटों से जेएनयू के किसी वास्तविक छात्र को कोई फायदा नहीं पहुंच सकता.

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जेएनयू के छात्रों की एकता ने यहां तक कि संघ के अपने छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को भी यह दावा करने पर मजबूर कर दिया है कि वह इस आंदोलन का समर्थन करती है – इस तथ्य से बेचैन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक कमेटी बना दी है, जिसका प्रत्यक्ष मकसद छात्रों द्वारा उठाये गये मुद्दों का समाधान करना है. लेकिन खबर है कि जेएनयू के वाइस चांसलर इस कमेटी की बैठक में उपस्थित तक होने से कन्नी काट रहे हैं. जेएनयू के छात्र अपनी मांगों के बारे में स्पष्ट हैं कि फीस में बढ़ोत्तरी तथा होस्टल के बाजारीकरण के प्रस्ताव को अवश्य ही और तुरंत वापस लेना होगा, और इन मुद्दों पर चर्चा करने वाली किसी भी कमेटी में जेएनयू छात्र संघ का प्रतिनिधित्व अवश्य ही होना होगा.

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जेएनयू का आंदोलन बड़ी तेजी से चारों ओर फैल रहा है – वह समूचे देश के कैम्पसों और छात्रों को अपने आगोश में ले रहा है. संघ और भाजपा विश्वविद्यालयों से नफरत करते हैं क्योंकि उनके सवालों को, भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टियों से कहीं अलग, सीबीआई और इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट की धमकियों से नहीं दबाया जा सकता! वे मोदी सरकार के गरीब-विरोधी, शिक्षा-विरोधी चेहरे का पर्दाफाश कर रहे हैं. भारत की जनता को ऐसे छात्र आंदोलन के साथ एकजुटता प्रदर्शित करनी होगी, जो भारत के युवाओं के भविष्य के लिये लड़ाई लड़ रहा है.

जेएनयू के छात्रा केवल अपने लिये नहीं संघर्ष कर रहे हैं. अगर जेएनयू में, जहां का छात्र आंदोलन इतना शक्तिशाली है, होस्टलों का सफलतापूर्वक बाजारीकरण कर दिया गया, तो अन्य कालेजों एवं विश्वविद्यालयों में भी, जहां फीस कम है (जिनमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी, हैदराबाद सेन्ट्रल युनिवर्सिटी भी शामिल हैं) छात्रों को जल्द ही इसी समस्या का सामना करना होगा.

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