वर्ष - 32
अंक - 2
07-01-2023

कोविड-19 वैश्विक महामारी के घातक विस्फोट के तीन वर्ष बाद अभी तक दुुनिया इसके विनाशकारी परिणामों से निकलने की कोशिश कर रही है. संयोगवश, किसी भी जगह से ज्यादा चीन से यह महामारी शुरू हुई थी और आज भी वह देश इस महामारी के नतीजे झेल रहा है, और यहां तक कि महामारी की रोकथाम के नाम पर राज्य के उत्पीड़नकरी कदमों के खिलाफ वहां बड़े पैमाने पर सामाजिक प्रतिवाद भी देखे गए हैं. दुनिया के अन्य भागों में कोविड महामारी दब जाने के बावजूद, जनता के विशाल तबके इसकी वजह से हुई आर्थिक गिरावट, और खासकर बड़े पैमाने पर रोजगार के नुकसान व मजदूरी में कटौती से परेशान हैं. यह आर्थिक झटका युक्रेन पर रूस के दुखद हमले के बाद पूरे युरोप के इस युद्ध में फंस जाने के चलते कई गुना तेज हो गया है.

दस महीना चलने के बाद भी इस युद्ध के खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. हम बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता वाला पुराना शीत युद्ध का माहौल बनता देख रहे हैं, और दुनिया एक बार फिर परमाणविक हथियारों के इस्तेमाल के मुहाने पर आ खड़ी हो गई है. दीर्घकालीन आर्थिक संकट और गिरावट के बीच युरोप में राजनीति ने बड़ा दक्षिणपंथी मोड़ ले लिया है, और वहां के अनेक देशों में नव-फासीवादी ताकतें खतरनाक तेजी से सर उठा रही हैं. बहरहाल, लैटिन अमेरिका में दक्षिणपंथी शासनों को कई-एक देशों में हाल में हुए चुनावों के दौरान सत्ताच्युत कर दिया गया है जिसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है ब्राजील में निरंकुश बोलसोनारो शासन की पराजय.

एशिया में हमारे पड़ोसी श्रीलंका में शक्तिशाली जनउभार ने वहां के राजपक्षा शासन को उखाड़ फेंका, और ईरान में ‘ड्रेस कोड’ के कथित उल्लंघन के चलते वहां की तथाकथित ‘नैतिकता पुलिस’ के द्वारा माहसा अमीनी की हत्या के बाद महिलाओं की अगुवाई में श्क्तिशाली प्रतिरोध उमड़ता दिख रहा है. ईरानी महिलाओं का यह शक्तिशाली प्रतिवाद वहां के धर्मतंत्रीय शासन द्वारा चलाये जा रहे दमन को धता बताते हुए दीर्घकालीन जन आन्दोलन के रूप में विकसित हो जा रहा है. इमरान खान सरकार की बेदखली के बाद पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता में फंस गया है – अन्य बातों के अलावा, इमरान खान की अमेरिका-विरोधी बयानबाजियों से पाकिस्तान के आला सैन्य अधिकारियों की नाराजगी उनकी बेदखली की बड़ी वजह बनी है.

भारत में साल 2022 गहराते आर्थिक संकट और बढ़ते फासीवादी हमलों का वर्ष रहा है. सकार ने पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड चुनावों के पूर्व आन्दोलनकारी किसानों से एमएसपी के अधिकार की गारंटी करने के बारे में किए गए वादों से खुली गद्दारी की है. श्रम अधिकारों को संगतिपूर्ण बनाने के नाम पर श्रमिक अधिकारों को नकारने और फरेबी नई पेंशन योजना के जरिये मजदूरों व कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को मखौल बना देने के बाद, सरकार ने सैन्य बलों में शामिल होने वाले 75 प्रतिशत युवाओं के लिए सैन्य रोजगार को चार साल का ठेका रोजगार बनाकर जबर्दस्त चोट पहुंचाई है. और अब यह चर्चा बढ़ती जा रही है कि अग्निवीर माॅडल को हर क्षेत्र में लागू करके बड़े पैमाने पर स्थायी रोजगार को अ-स्थायी ठेका रोजगार में बदल दिया जाएगा.

जहां आम जनता पर बढ़ती कीमतों, लुप्त होते रोजगार और घटती आमदनी की भारी चोट पड़ रही है, वहीं सरकार इन ज्वलंत मुद्दों को सार्वजनिक विमर्श से हटा देने पर आमादा है. संघ ब्रिगेड की कर्नाटक प्रयोगशाला ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की इस्लामभीतिक मुहिम को धारदार बनाने के लिए हिजाब पर प्रतिबंध का ईजाद किया. कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा को अत्यंत उन्मादक और भावनात्मक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का दूसरा असरदार हथियार बना दिया गया और ‘कश्मीर फाइल्स’ फिल्म को लेकर  सरकारी तौर पर संगठित प्रचार अभियान चलाया गया. ढहाए गए बाबरी मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से उत्साहित होकर (हालांकि उसी फैसले में कोर्ट ने मस्जिद ढहाने को कानून के शासन के संवैधानिक ढांचे का घोर उल्लंघन बताया  है), भाजपा अब खुलेआम 1991 के अधिनियम को चुनौती दे रही है जिसमें यह कहकर उपासना स्थलों पर चल रहे तमाम विवादों पर रोक लगा दी गई है कि 15 अगस्त 1947 के दिन उन स्थलों का जो चरित्र था, वही अंतिम है और उसे बदला नहीं जाएगा.

असहमति की आवाज को खामोश कर देने के सरकार के प्रयासों को पूरा करते हुए अब भारत के धनी काॅरपोरेट घराने ने उस प्रमुख टीवी चैनल को खरीद लिया है जो ‘गोदी मीडिया’ के तौर-तरीकों से परे भारतीय जनता के सामने खड़े ज्वलंत मुद्दों को उठाता रहता था. इस प्रकार, मुख्यधारा का मीडिया अब लगभग पूरी तरह पालतू मीडिया में बदल गया है और वह शासन के झूठ फैलाने और ध्यान भटकाने वाली मुहिम में साझीदार हो गया है. भारत के सर्वाधिक प्रभावकारी हिंदी टीवी पत्रकार रवीश कुमार नफरत और झूठ के फासिस्ट प्रचार अभियान का मुकाबला करने के लिए जीविका और स्वतंत्रता के बुनियादी मुद्दों को उठाते रहते थे, लेकिन उन्हें मुख्यधारा टीवी माध्यम को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया (रवीश जिस टीवी चैनल एनडीटीवी के प्रमुख पत्रकार थे, उसे काॅरपोरेट अडानी ने खरीद लिया है). खौफ और लादी गई खामोशी के इस सर्वव्याप्त माहौल के बावजूद जनता की आवाज चुनावी अखाड़े तक में गूंज उठती है, जैसा कि हमने हिमाचल प्रदेश के चुनाव में देखा; और साथ ही, न्यापालिका अभी भी समय-समय पर कार्यपालिका को फटकार लगाती रहती है तथा उसके बुलडोजर को रोकती रहती है, जैसा कि आनंद तेलतुंबड़े को जमानत देने और निर्वाचन आयोग में नियुक्तियों पर सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों से दिखता है. इसीलिए अब सरकार न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया पर ही नियंत्रण कायम करके न्यायपालिका पर अंकुश लगाने की जी-तोड़ कोशिश कर रही है – केंद्रीय कानून मंत्री ने तो संसद के पटल पर ही जमानत और लोक हित याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना कर डाली है.

इससे अधिक स्पष्ट लड़ाई और क्या देखी जा सकती है! भारत अब अपने गणतंत्र की स्थापना की 73वीं सालगिरह मनाने के लिए तैयार हो रहा है. भारत की जनता को स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा और न्याय की संवैधानिक उद्घोषणा की भावना में गणतंत्र की पुनस्र्थापना के लिए अपनी समूची शक्ति और साहस को झोंक देना होगा. उपनिवेशवाद से आजादी ने हमें आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की ओर आगे बढ़ने के लिए संविधान दिया है, अब हमें आजादी की दूसरी लड़ाई – फासीवाद से लड़ाई – को जीत कर अपने संविधान को बचाने की जरूरत आ गई है.