वर्ष - 33
अंक - 8
20-02-2024
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इस बार हवा ने भी अपना रूख बदला और पलटासन कुमार के चेहरे की कुटिल मुस्कान ही गायब कर दी. लेकिन पटना में तेजी से बदल रहे राजनीतिक घटनाक्रम से पलटासन कुमार से भी ज्यादा बेचैनी दिल्ली में बैठे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को थी. यह अब बच्चा-बच्चा जानता है कि मोदी-शाह बिहार की सत्ता हड़पने को क्यों बेचैन थे? राममंदिर की प्राणप्रतिष्ठा को तमाम संवैधानिक प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाकर एक राजनीतिक समारोह में बदल देने के बावजूद उनके 400 पार के बड़बोले दावे में बिहार ही सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा था. भाजपा को अच्छे से पता है कि वह बिहार में अकेले दम पर लोकसभा चुनाव में कोई हैसियत नहीं रखती. इसलिए उसने एक बार फिर नीतीश कुमार पर दांव खेला और बिहार की सत्ता हड़प ली और सामाजिक न्याय से घोर विश्वासघात करते हुए नीतीश कुमार भी भाजपा के लिए बिहार में एक बार फिर से कालीन बिछाने के लिए नतमस्मक हो गए. बहुत दिन नहीं हुए जब भाजपा के लिए उन्होंने कहा था कि ‘मर जाऊँगा, लेकिन उनके साथ नहीं जाऊंगा।’ पल भर में ही नीतीश कुमार की बोली-भाषा सबकुछ बदल गई, लेकिन बिहार की जनता की निगाह में उन्होंने अपना विश्वास पूरी तरह खो दिया है. इतिहास में वे पलटूराम की उपाधि से अपना नाम दर्ज करा चुके हैं.

17 महीने पहले जब नीतीश कुमार ने भाजपा का छोड़कर महागठबंधन का दामन थामा था, तब न केवल बिहार ने बल्कि पूरे देश ने उसका स्वागत किया था. 17 महीनों में महागठबंधन सरकार ने अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद काम भी अच्छा किया. जिसकी सब जगह चर्चा रही. फिर ऐसा क्या हुआ कि नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव के ऐन वक्त पर पलटी मार दी? यह तो वक्त बताएगा कि इस बार पलटी मारने के पीछे की वजहें क्या थीं? कुछ-कुछ वजहें सामने आ भी रही हैं. सियासी और मीडिया के गलियारों में इसकी खूब चर्चा है कि विदेश में अकूत संपत्ति रखने के मामले में जद (यू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह और नीतीश कुमार के खासमखास मंत्री विजय कुमार चौधरी के निजी फाइनेंसर ईडी की पकड़ में आ चुके हैं. इसकी आंच नीतीश कुमार के निजी सचिव दीपक कुमार तक भी पहुंच रही है. यह भी कहा जा रहा है कि उनकी ये सारी फाइलें मोदी व अमित शाह के हाथ लग चुकी हैं. इसमें कितनी सच्चाई है यह तो वक्त बताएगा, लेकिन मामला कुछ तो है. जद(यू) के विधानपार्षद राधाचरण सेठ तो भ्रष्टाचार के घेरे में आ ही चुके हैं. अब नीतीश कुमार हेमंत सोरेन तो नहीं हैं, जो बहादुरी से भाजपा का मुकाबला करते, जेल जाते, लेकिन भाजपा के सामने समर्पण नहीं करते. नीतीश कुमार के लिए यह असंभव था. क्योंकि वे जानते हैं कि उनके साथ उनकी पार्टी का खात्मा तय है. मामला चाहे जो हो, सच यही है कि सामाजिक न्याय से विश्वासघात करते हुए नीतीश कुमार ने भाजपा का दयापात्र बनना स्वीकार कर लिया. सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा को उपमुख्यमंत्री बनाकर भाजपा ने उनको सैंतने का पूरा प्रबंध कर दिया है. अब पटना की सड़कों पर सामाजिक न्याय के नारों की जगह लव-कुश-परशुराम सरकार के पोस्टर-बैनरों की बाढ़ आ गई है. सिवान से लेकर भोजपुर तक सामंती ताकतों का बढ़ा हुआ मनोबल दिख रहा है. नीतीश कुमार की इसी संदेहास्पद विश्वसनीयता को देखते हुए ही इंडिया गठबंधन ने उन्हें गठबंधन का संयोजक नहीं बनाया था. समय ने इसको सही साबित किया.

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में 12 फरवरी का दिन महत्वपूर्ण था. उसी दिन विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया. मीडिया में ये कयास लग रहे थे कि भाजपा व जद(यू) के कुछ विधायक इस बार अपनी ही पार्टी का विरोध करेंगे. बात हजम नहीं होती थी, लेकिन बिहार ने सच में एक बार फिर सबको चौंका दिया. भाजपा-जद (यू) सरकार ने सत्ता के भारी दुरूपयोग के जरिए विधानसभा के पटल पर बहुमत तो हासिल कर लिया, लेकिन असली लड़ाई विधानसभा के अध्यक्ष पद से अवध बिहारी चौधरी को हटाने वाली प्रक्रिया में थी और उसमें भाजपा-जद (यू) गठबंधन बाल-बाल बचा. संसदीय परंपरा का तकाजा रहा है कि अध्यक्ष के चुनाव या उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया में पार्टी व्हिप प्रभावी नहीं होती. भाजपा-जद (यू) को जब एहसास हो गया कि उनकी पार्टी के कई विधायक उनके खिलाफ हैं, तो अपनी ही पार्टी विधायकों के खिलाफ उन्होंने धर-पकड़ का बेशर्म अभियान चलाया. रांची से लौटते जद (यू) विधायक डॉ. संजीव को नवादा में प्रशासन ने अपनी गिरफ्त में ले लिया और वे  पुलिस कस्टडी में ही पटना तक आए. भाजपा विधायकों को बोधगया में बांधकर रखने के बाद भी मौका लगते ही कई विधायक लापता हो गये. यह आघात नीतीश कुमार से कई गुना अधिक केंद्र में सत्ताशीन पीएम नरेंद्र मोदी के 2024 के मंसूबों पर तुषारापात साबित होने जा रहा था, जिसे हर हाल में ठीक करना था। तब भाजपा-जद(यू) ने दूसरी चाल चली. सत्ता का खौफ दिखाकर विपक्ष के विधायकों को तोड़ने का प्रयास किया और अंततः राजद के तीन विधायकों को तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली. वर्ना नीतीश कुमार इस बार सदन में विश्वास-मत हासिल करने से चूक जाने वाले थे. राजद विधायक चेतन आनंद को जिस प्रकार से पुलिस दल-बल ने तेस्जवी यादव के आवास से रात के अंधेरे में उठाया, उसने सत्ता तंत्र के भारी दुरूपयोग के सच को बेनकाब कर दिया. यह तो वक्त बताएगा कि चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रहलाद यादव को भाजपा-जद(यू) ने कौन सी धमकी दी या फिर कौन से प्रलोभन दिए, लेकिन उनके खुद के पांच विधायक विधनसभा अध्यक्ष को पद से हटाने के मामले में अनुपस्थित रहे. संभव था कि यदि राजद के तीन विधायकों को भाजपा - जद(यू) ने अपने पक्ष में नहीं कर लिया होता, तो सत्ताधारी पार्टी के कई और विधायक खुलकर विरोध में आते और विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी को हटाने के मसले पर ही सरकार अल्पमत में आ जाती. इस पूरे प्रसंग में भाकपा-माले, सीपीआई, सीपीएम और कांग्रेस के सभी विधायक मजबूती से एकताबद्घ रहे. इसी राजनीतिक उठापटक के ठीक अगले ही दिन एक कथित हत्या के मामले में, जिसकी पुष्टि भी नहीं हुई है, माले के युवा नेता व विधायक मनोज मंजिल सहित 23 लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई. भाजपा के लोग पहले से ही प्रयास में लगे हुए थे और इस अन्याय का संबंध भी वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ता है. भोजपुर में लंबे समय से भाजपा और सामंती ताकतें माले नेताओं को जेल भेजकर या जनसंहार रचाकर गरीबों के आंदोलन को रोक देने की कोशिशें करती रही हैं. इसी कोशिश में यह अन्याय हुआ है. बिहार इसका मुकम्मल जवाब देगा. 

बहरहाल, 17 महीनों की महागठबंधन सरकार ने जो उपलब्धियां हासिल की, वे 17 सालों की भाजपा-जद(यू) सरकार पर भारी पड़ती हैं. बिहार में बहुप्रतीक्षित 2 लाख शिक्षकों की स्थायी बहाली ने सचमुच एक इतिहास रचा. इतना ही नहीं, यह महागठबंधन की ही ताकत थी जिसके बल पर नीतीश कुमार जातिगत जनगणना जैसा साहसिक निर्णय लागू करा सके। भाकपा-माले ने महागठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया था. समय ने भाकपा-माले के स्टैंड को सही साबित किया. इन 17 महीनों में माले विधायक दल सरकार और जनता के बीच एक सार्थक कड़ी बना रहा. उपर्युक्त मामलों के अलावा नियोजित शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा दिलवाने और स्कीम वर्करों के मानदेय में बढ़ोतरी जैसी महत्वपूर्ण लड़ाइयों में माले विधायक दल की भूमिका उल्लेखनीय रही.

इस बार बिहार के दलित-गरीबों-अतिपिछिड़ा व पिछड़ा समुदाय को नीतीश कुमार का पलटासन बेहद नागवार गुजरा है. चुनाव के ठीक पहले पलटासन के जरिए नीतीश कुमार ने इंडिया गठबंधन को कमजोर करने की कोशिश की है. बिहार के गरीबों व युवाओं ने मन बना लिया है.  भाकपा-माले महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने ठीक ही कहा कि नीतीश कुमार अब नफरत, झूठ, लूट और बर्बरता के एजेंडे के साथ बिहार को तबाह करने पर आमदा आक्रामक भाजपा की दया पर जीवित हैं. बिहार अनुकरणीय साहस और संकल्प के साथ फासीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई जारी रखेगा. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा-जद(यू) की करारी शिकस्त ही भाजपा और नीतीश कुमार को मुकम्मल जवाब होगा. और नीतीश कुमार ने अपने विश्वासघात के जरिए खुद 2025 में भाजपा-नीतीश मुक्त बिहार का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.