वर्ष - 29
अंक - 24
30-04-2020

अमरीका में आजकल संस्थागत नस्लवादी पक्षपात और पुलिस द्वारा बर्बर हिंसा के खिलाफ आंदोलन में बड़े पैमाने का उभार आया हुआ है. इस उभार का कारण बनी हाल की एक घटना, जिसमें मिनेपोलिस के श्वेत पुलिस अधिकारियों ने एक अफ्रीकी-अमरीकी अश्वेत पुरुष जार्ज फ्रलाॅयड को सड़क पर मुंह के बल लिटा दिया, और उनमें से एक पुलिस अधिकारी ने फ्रलाॅयड की गर्दन को अपने घुटने से दबाये रखा. तमाम लोगों के सामने उस पुलिसवाले ने फ्रलाॅयड का गला घोंटना जारी रखा जबकि फ्रलाॅयड लगातार चीख रहे थे कि उनका दम घुट रहा है और वे मर रहे हैं. फ्रलाॅयड की हत्या कोई अपवादस्वरूप घटना नहीं है – यह पुलिस और यहां तक कि श्वेत अमरीकी नागरिकों द्वारा अफ्रीकी-अमरीकी लोगों की हत्या की लम्बी शृंखला में हाल में घटित एक घटना मात्र है.

अगर अमरीका में इस किस्म की हत्याओं की तादाद बहुत बड़ी है, तो उससे भी बड़ी संख्या में ऐसी नस्लवादी घटनाएं घटित होती रहती हैं, जिनमें पुलिसवाले मनमाने ढंग से अश्वेत लोगों को गिरफ्तार कर लेते हैं और उनको बर्बर यातनाएं देते हैं, जिसमें उनकी जान तक चली जाती है, और जिनमें श्वेत नस्लवादी लोग अश्वेत लोगों को धमकी देने और भय दिखलाने के लिये पुलिस को बुला लेते हैं.

पुलिस में और आपराधिक न्याय प्रणाली में संस्थागत रूप से पैठे नस्लवादी पक्षपात के खिलाफ तथा नस्लवादी हत्याओं के मामलों में न्याय करने से प्रणालीबद्ध रूप से इन्कार के खिलाफ ‘ब्लैक लाइव्ज मैटर’ (अश्वेतों की जान भी कीमती है) आंदोलन कई वर्ष पहले शुरू हुआ था और आज भी जारी है. ये प्रतिवाद ही बता रहे हैं कि अमरीकी पुलिस का किस हद तक सैन्यीकरण हो गया है, और उसका सैन्यीकृत बुनियादी ढांचा एवं प्रशिक्षण किस हद तक इजरायल की औपनिवेशिक कब्जावर राजसत्ता के माॅडल की राह पर चल रहा है. प्रतिवादों की वर्तमान लहर हालांकि पिछली प्रतिवादी लहरों का जारी रूप है, पर इस बार उसका पैमाना और प्रभाव अभूतपूर्व और ऐतिहासिक है.

कोविड-19 की वैश्विक महामारी ने अश्वेत समुदाय पर अनुपात से कहीं ज्यादा असर डाला है, जो इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि इन समुदायों के लोग अत्यधिक बड़ी तादाद में गरीब हैं, जिनके नाम दस्तावेजों में नहीं दर्ज हैं, वे सबसे कमजोर और असुरक्षित मजदूर वर्ग के अंश हैं. अमरीकी समाज में असमानता की प्रणालीबद्ध और गहरी खाइयों ने वैश्विक महामारी द्वारा पैदा की गई अव्यवस्था और उथल-पुथल के दरपेश इस समुदाय को खास तौर पर शिकार बनाया है. अब लोग इन प्रणालीगत असमानताओं एवं अन्यायों के खिलाफ गुस्से से उठ खड़े हुए हैं और वे जवाबदेही की मांग कर रहे हैं.

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हालांकि ये प्रतिवाद अधिकांशतः शांतिपूर्ण रहे हैं, पर कुछेक ऐसी घटनाएं जरूर हुई हैं जिनमें आक्रोशित प्रतिवादकारियों ने पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी है या फिर दुकानों पर अपना गुस्सा उतारा है. यह गुस्सा और आक्रोश पूर्णतया जायज है, और वास्तव में कई विध्वस्त इमारतों एवं दुकानों के मालिकों ने प्रतिवादकारियों के साथ एकजुटता जाहिर की है. मगर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रतिवादकारियों को “डाकू” और “लुटेरा” बताया, और उन्होंने प्रतिवादकारियों के खिलाफ नेशनल गार्ड्स को उतार दिया है, और सड़कों पर “काबू पाने” के लिये सेना को उतार देने की जरूरत बताई है. सैन्यीकृत पुलिस के खिलाफ आक्रोश की आग में घी डालते हुए ट्रम्प ने प्रतिवादकारियों को गोली मार देना, अथवा गिरफ्तार करना और कम से कम दस साल तक के लिये जेल में डाल देना जरूरी बताया है.

ट्रम्प का नारा “जब लूट शुरू होती है, तो शूटिंग (गोली मारो) शुरू होती है” हमें अमरीकी इतिहास की उन घटनाओं की याद दिला है जब 8 घंटे काम का दिन की मांग पर हड़ताल कर रहे मजदूरों को, या फिर नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे नस्लवाद-विरोधी प्रतिवादकारियों को “लुटेरा” बताया गया था; तथा अखबारों एवं राजनीतिज्ञों ने उनको गोली मार देने की जरूरत बताई थी. वर्तमान में हो रहे प्रतिवादों ने तथा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर ट्रम्प प्रशासन द्वारा दमन ने अमरीकी लोकतंत्र की कमजोरी को समूची दुनिया के सामने ला दिया है, और अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सैनिक तानाशाह बनने की हसरत को उजागर कर दिया है.

यहां याद करना उपयुक्त होगा कि भारत में भाजपा के एक नेता द्वारा दिया नारा “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को” ट्रम्प के नारे “जब लूट शुरू होती है, तो शूटिंग (गोली मारो) शुरू होती है” का जुड़वां नारा है. ठीक जैसे ट्रम्प नस्लवाद-विरोधी प्रतिवाकारियों को लुटेरा बता रहे हैं, और उनका जनसंहार करने की जरूरत बता रहे हैं, वैसे ही भाजपा और मोदी सरकार ने लोकतंत्र के पक्षधर, सीएए-विरोधी प्रतिवादकारियों को “देशद्रोही” का तमगा दिया था और उनका जनसंहार करने तथा उन्हें गोली मार देने का आह्वान किया था. फरवरी 2020 में, जब नरेन्द्र मोदी भारत में ट्रम्प के भव्य स्वागत में व्यस्त थे, तब दिल्ली में कपिल मिश्रा जैसे भाजपा के नेतागण भीड़-हत्या गिरोहों को सीएए-विरोधी प्रतिवादकारियों एवं इन प्रतिवादों का समर्थन करने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हमला करने तथा उनकी हत्या कर देने को उकसा रहे थे.

अब उसी कपिल मिश्रा ने ट्वीट किया है कि अमरीका को उसकी मिसाल पर चलना चाहिये और महसूस कर लेना चाहिये कि जब “गलत लोग” सड़कों पर कब्जा कर लें तो उन्हें रोकने के लिये “सही लोगों” को भी सड़क पर उतरना होगा. इसका संकेत स्पष्ट है – भाजपा के नजरिये में अफ्रीकी-अमरीकी, अश्वेत और अमरीका के नस्लवाद-विरोधी लोग तथा भारत में साम्प्रदायिकता-विरोधी प्रतिवादकारी “गलत लोग” हैं, जबकि अमरीका में गोरी चमड़ी के श्रेष्ठतावादी और भारत में साम्प्रदायिक फासीवादी संगठनों के कार्यकर्ता “सही लोग” हैं.

अब वक्त आ गया है कि भारत की पुलिस व्यवस्था और आपराधिक न्याय व्यवस्था में प्रणालीगत रूप से पैठे साम्प्रदायिक, जातिवादी और वर्गीय पक्षपात की मौजूदगी को स्वीकार कर लिया जाये. यह पक्षपात कोई नई बात नहीं है – स्वतंत्र भारत के इतिहास में मुसलमानों, सिखों और ईसाई अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, कश्मीरियों, मणिपुरी और नगालैंड के लोगों के पुलिस एवं सशस्त्र बलों द्वारा किये गये जनसंहार, तथा साम्प्रदायिक एवं सामंती संगठनों द्वारा मुसलमानों और दलितों के जनसंहार की घटनाएं भरी पड़ी हैं. शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस, लाठी और गोली (और कश्मीर के मामले में पैलेट गन) का इस्तेमाल तो आम बात है. ऐसी अधिकांश घटनाओं में न्याय देने से प्रणालीगत रूप से इन्कार किया जाता रहा है, और कत्लेआम को अंजाम देने वालों की पदोन्नति की जाती है तथा उन्हें राजनीतिक सत्ता की गद्दी सौंप दी जाती है.

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अमरीका की जेलों में अफ्रीकी-अमरीकी तथा अश्वेत लोग आबादी के अनुपात में कहीं ज्यादा, भारी बहुसंख्या में भरे पड़े हैं – और यही बात भारत में दलितों, आदिवासी और मुस्लिम लोगों के लिये भी सच है. जेल में कैद मुस्लिम, दलित और आदिवासी लोगों की संख्या भारतीय जेलों की कुल आबादी का 53 प्रतिशत है. पुलिस द्वारा इन तबकों के लोगों को, जिनका शुमार भारत के सबसे गरीब लोगों में भी होता है, यातना देना, उन पर झूठे आरोप लगाना और उन्हें नकली मुठभेड़ (दरअसल हिरासत में हत्या) में मार देना कोई अपवाद नहीं बल्कि नियम बन गया है.

मोदी शासन के पिछले छह वर्षों के दौरान ये प्रणालीगत पक्षपात और भी प्रकट रूप से जाहिर हो रहे हैं. साम्प्रदायिक भीड़-गिरोहों द्वारा मुसलमानों की हत्याएं हुई हैं, और पुलिस ने न सिर्फ इन हत्यारे गिरोहों को संरक्षण दिया है बल्कि मरते हुए मुसलमानों के साथ अमानवीय कृत्य भी किये हैं. हाल ही में कोविड-19 महामारी के दौरान मध्य प्रदेश के बैतुल में पुलिस ने एक दलित व्यक्ति को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया. बाद में पुलिस ने उनसे यह कहते हुए “माफी” मांगने की कोशिश की कि उन्होंने गलती से उनकी दाढ़ी को देखकर उनको मुसलमान समझ लिया था! सीएए-विरोधी प्रतिवादों के दौरान पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक छात्र को अंधा कर दिया था और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक छात्र का अंगभंग कर दिया था, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में मुसलमानों की आंख में गोली मार दी, निहत्थे मुसलमानों की गोली मारकर हत्या कर दी, और सुनियोजित रूप से मुस्लिम घरों में तोड़फोड़ और लूटपाट मचाई.

आजकल पुलिस सीएए-विरोधी प्रतिवादों में शामिल कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने में व्यस्त है जबकि वह हिंसा को सचमुच अंजाम देने वाले लोगों पर आरोप लगाने तक से इन्कार कर रही है. एडवोकेट कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज जैसे लोगों को, जिन्होंने छत्तीसगढ़ में पुलिस एवं सशस्त्र बलों द्वारा मनमाने ढंग से गिरफ्तार किये गये एवं हिरासत में यातनाएं झेल रहे आदिवासियों को कानूनी सहायता दी, मोदी शासन के अंतर्गत झूठे इल्जाम लगाकर निरंकुश अत्याचारी यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून) के तहत जेल भेज दिया गया है. ट्रम्प प्रतिवादकारियों को कम से कम दस साल के लिये जेल भेजने की जरूरत बता रहे हैं; भारत में आजकल सीएए-विरोधी कार्यकर्ताओं को कोविड-19 की वैश्विक महामारी के दौरान भी यूएपीए के तहत जेल में डाला जा रहा है, जिसमें लम्बे अरसे तक बिना मुकदमा चलाये या जमानत दिये जेल में रखने की इजाजत दी गई है. इसी तरह कश्मीरियों को निरंकुश अत्याचारी पीएसए (सार्वजनिक सुरक्षा कानून) के तहत बिना कोई मुकदमा चलाये दशकों की अंतहीन अवधि तक जेलों में डाला गया है.

दिल्ली में पुलिसवालों द्वारा फैजान को, जो पुलिस की मार के जख्मों से मरने के कगार पर था, बूटों की ठोकर मारने और उसे राष्ट्रीय गीत (जो सीएए-विरोधी आंदोलन का प्रतिवाद गीत एवं गोलबंदी की हुंकार बन गया था) गाने पर मजबूर करने का वीडियोटेप, अमरीकी पुलिस बलों द्वारा जाॅर्ज फ्रलाॅयड की गला घोंटकर हत्या करने के वीडियोटेप की तुलना में भारत में पुलिसवालों के पक्षपाती रवैये और बर्बरता को कोई कम जोरदार ढंग से नहीं जाहिर करता.

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अमरीका में जो जनता का आंदोलन चल रहा है वह जाॅर्ज फ्रलाॅयड के लिये तथा उन तमाम अफ्रीकी-अमरीकी लोगों के लिये जिनकी हत्या नस्लवादी पुलिस एवं नागरिकों द्वारा की गई है, न्याय की मांग कर रहा है – और प्रणालीगत नस्लवाद एवं पुलिस के सैन्यीकरण तथा आपराधिक न्याय व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहा है. इस क्रांतिकारी आंदोलन के साथ एकजुटता में खड़े होने के साथ-साथ हम भारत के लोग भी मांग करते हैं कि भारत में पुलिस एवं राज्य मशीनरी द्वारा प्रणालीगत रूप से किये जा रहे पक्षपात और अत्याचारों के यथार्थ को स्वीकार किया जाय, जिसका इस्तेमाल मोदी सरकार मुस्लिम अल्पसंख्यकों एवं लोकतंत्र के पक्षधर प्रतिवादकारियों के खिलाफ औजार के बतौर कर रही है.