वर्ष - 28
अंक - 43
15-10-2019

प्रधानमंत्री मोदी के अमरीका सफर के दौरान ह्यूस्टन में हुई उनकी रैली में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मौजूदगी ने दोनों धुर दक्षिणपंथी फासिस्ट राजनीतिज्ञों की वैचारिक नजदीकी को ही रेखांकित किया है.

हिंदुत्व श्रेष्ठतावादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंतर्राष्ट्रीय सदस्यों द्वारा संगठित “हाउडी मोदी” रैली दूसरे रूप से ट्रम्प के लिये चुनाव प्रचार अभियान की रैली भी थी, क्योंकि ट्रम्प को 2020 में चुनाव का सामना करना है. मोदी ने ट्रम्प को “उम्मीदवार ट्रम्प” कहा और ट्रम्प के चुनाव प्रचार अभियान का मोदी. प्रभावित नारा लगाया “अबकी बार ट्रम्प सरकार” – यानी दरअसल भारतीय मूल के अमरीकावासियों से अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में ट्रम्प को वोट देने की अपील की. इस प्रकार मोदी दुनिया के किसी भी देश के पहले निर्वाचित नेता हैं, जिन्होंने किसी दूसरे देश में होने वाले चुनाव में एक उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार किया है.

इस कार्यक्रम में दिये गये अपने भाषण में विडम्बनापूर्वक प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में भाषाओं, धर्मों, खान-पान की विविधता की चर्चा की – वह विविधता जिसे उन्होंने खुद, उनकी सरकार ने और संघ परिवार ने अपने देश भारत में हमले का निशाना बना रखा है! उन्होंने दावा किया कि उनकी सरकार ने धारा 370 को इसलिये खारिज किया है ताकि इस बात को सुनिश्चित किया जा सके कि “कश्मीर के लोगों को अब वही अधिकार प्राप्त हो सकें जो बाकी भारत की जनता को हासिल हैं.” अगर कश्मीर के हालात देखे जायं, जो एक कैदगाह में तब्दील हो चुका है, जो संचार व आवागमन की सुविधा से, राजनीति और प्रतिवाद के अधिकार से वंचित है, और जहां के लोगों को गैरकानूनी तौर पर गिरफ्तार किया जा रहा है और यातनाओं का शिकार बनाया जा रहा है, तो यह दावा सिर चकरा देता है.

मोदी द्वारा भारत में विविधता और लोकतंत्र के बारे में किये गये पाखंडी दावों का पर्दाफाश खुद ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में ही हो गया. इस कार्यक्रम के आयोजकों ने भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक कामेडियन हसन मिन्हाज को इस आधार पर रैली में शामिल होने से रोक दिया कि उनके द्वारा प्रस्तुत शो में मोदी की आलोचना होती रही है. लेकिन जहां मिन्हाज को हाॅल में घुसने से ही रोक दिया गया, वहीं हाॅल के अंदर मिन्हाज की तस्वीर बड़े पर्दे पर दिखलाई गई कि वे भारतीय मूल के कई सफल अमरीकियों में से एक हैं! मिन्हाज की तस्वीर तो विविधता के प्रतीक के रूप में दिखला दी गई, मगर खुद मिन्हाज को मोदी की आलोचना के चलते कार्यक्रम में आने से रोक दिया गया. इस प्रकार, मोदी जब विदेश के सफर में रहते हैं तो वे भारत के संविधान, लोकतंत्र और विविधता के बारे में जबानी जमाखर्च करते रहते हैं, जबकि अपने देश में ठीक उन्हीं चीजों के खिलाफ हमला बोलते रहते हैं.

इस कार्यक्रम में ट्रम्प ने अपने भाषण में “सीमा सुरक्षा” के बारे में अपनी चिंता जाहिर की, जिसमें अमरीका और भारत दोनों साझीदार हैं – इस प्रकार ट्रम्प ने “अवैध आप्रवासियों” का हौवा खड़ा करके उनके खिलाफ “सीमा पर दीवार खड़ी करने” से सम्बंधित चुनावी घृणा प्रचार करते हुए परोक्ष रूप से भाजपा की कुटिल एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) परियोजना के प्रति अपना समर्थन जाहिर किया, जिसके चलते भारत में दसियों लोगों पर राज्यविहीन बन जाने का खतरा मंडरा रहा है.

भारत में अर्थतंत्र बस केवल मोदी की नीतियों के चलते ही गहरे संकट में फंसा हुआ है – जो ह्यूस्टन में मोदी के भाषण में किये गये इस दावे को कि भारत में “सब कुछ ठीक-ठाक है”, साफ तौर पर झुठला रहा है. ह्यूस्टन के भाषण में और साथ ही संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने दिये अपने भाषण में मोदी ने खुले में शौच के खिलाफ चलाये गये स्वच्छ भारत अभियान की तथाकथित सफलता के बारे में तारीफों के पुल बांधेलेकिन लम्बे-चौड़े दावों के पीछे छिपी कठोर सच्चाई यह है कि यह अभियान अल्पसंख्यकों और दलितों की गिरोहबंद भीड़ द्वारा हत्याओं का एक बहाना बना है, जबकि दिल्ली में सफाई कर्मचारी आज भी सीवर (गंदा नाला) की सफाई करते करते मौत के शिकार बन रहे हैं. अभी चंद दिनों की बात है कि मध्य प्रदेश में दो दलित बच्चों को एक गिरोहबंद भीड़ ने इस बहाने मार डाला कि वे खुले में शौच कर रहे थे.

चाटुकार भारतीय गोदी मीडिया की मदद से मोदी और भाजपा ने यह दावा करने का प्रयास किया है कि मोदी की अमरीका यात्रा और ट्रम्प द्वारा ह्यूस्टन रैली में मोदी की प्रशंसा और कश्मीर एवं पाकिस्तान के प्रति भारत सरकार द्वारा अपनाई गई स्थितियों की पुष्टि उनको महान राजनीतिज्ञ के बतौर स्थापित करती है. मगर ट्रम्प ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ भी एक प्रेस कान्फ्रांन्स को सम्बोधित किया जिसमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत करने का आह्वान किया, और साथ ही कश्मीर पर मध्यस्थता करने का अपना प्रस्ताव दुहराया, और भारत के इस दावे से साफ तौर पर इनकार कर दिया कि पाकिस्तान आतंकवाद की धुरी है. दूसरे शब्दों में, उन्होंने खुद को स्पष्ट तौर पर मोदी और भारत सरकार के बयान से – पाकिस्तान के आतंकवाद से रिश्तों के बारे में और कश्मीर के भारत के “आंतरिक मामला” होने के बारे में – खुद को बिल्कुल अलग कर लिया.

नरेन्द्र मोदी और इमरान खान के साथ की गई अपनी प्रेस कान्फ्रांसों में ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में हो रही चाटुकारिता भरी रिपोर्टिंग की तारीफ की. ट्रम्प अमरीकी पत्रकारों से अपने प्रतिकूल सम्बंधों के मामले में विख्यात हैं – क्योंकि ये पत्रकार लगातार उनकी नीतियों के बारे में उनसे सवाल करने अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं. अतः भारत और पाकिस्तान के पत्रकारों के बारे में उनकी प्रशंसा यह दर्शाती है कि इन दोनों देशों के पत्रकार अपने पेशे को बदनाम कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते वक्त मोदी ने पूरी बेशर्मी से कश्मीर को कैदखाना बना देने के मामले में चुप्पी साध ली. मगर अगर उन्होंने यह उम्मीद पाली थी कि उनकी चुप्पी कश्मीर पर सारी दुनिया में हो रही चर्चा को रोक देगी, तो वे गलत साबित हुए. न सिर्फ विदेशी नेताओं (चीन, पाकिस्तान, मलयेशिया, तुर्की) ने कश्मीर पर अपनी आवाज उठाई बल्कि संयुक्त राष्ट्र भवन के बाहर कश्मीर के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए एक विशाल प्रतिवाद भी संगठित किया गया. इसी प्रकार ह्यूस्टन में तथा अमरीका में अन्य स्थानों पर कश्मीर से एकजुटता में बड़े-बड़े और जोशीले प्रतिवाद प्रदर्शन हुए, जिनमें मोदी और ट्रम्प की नीतियों के बीच, और संघ की हिंदू श्रेष्ठतावादी धुर दक्षिणपंथी राजनीति तथा श्वेतों की श्रेष्ठतावादी राजनीति, जिसके प्रतिनिधि ट्रम्प हैं, के नाजायज रिश्तों को भी रेखांकित किया गया.

मोदी की अमरीका यात्रा ने उनको कोई “विश्व के महान नेता” के बतौर नहीं स्थापित किया है – उसने केवल दुनिया के अत्याचारी, निरंकुश शासकों और फासिस्टों के बीच उनके स्थान की ही पुष्टि की है.