कामरेड हरिनंदन सिंह

बिहार के ट्रेड यूनियन के कद्दावर नेता कामरेड हरिनंदन सिंह का 1 जुलाई 2019 को निधन हो गया. वे करीब 90 वर्ष के थे. का. हरिनंदन 1949 में मैट्रिक पास करने के बाद से ही राजनीतिक रूप से सक्रिय भूमिका लेने लगे थे. सन् 1952 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गोदानी सिंह के पक्ष में सक्रियता से काम किया. 1955 में नौसेना में उनकी नौकरी लगी, लेकिन उन्होंने ज्यादा दिनों तक यह नौकरी नहीं की. बिहार सरकार के कृषि विभाग में नौकरी करते हुए वे कर्मचारी आंदोलन में सक्रिय हुए और 1970 में का. योगेश्वर गोप से प्रभावित होकर बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के नेता बने. का. योगेश्वर गोप के साथ ही वे 1989 में आईपीएफ और भाकपा(माले) से जुड़े.

औरंगाबाद में कर्मचारी महासंघ का अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने वहां महासंघ के कार्यालय का निर्माण करवाया. 1982 से अवकाश प्राप्ति तक, जब वे जहानाबाद जिले में रहे, संगठन व आंदोलन को मजबूत करने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी. वे किसान-मजदूरों के सवाल पर होने वाले आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाते थे. 1994 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने मजदूर-किसानों के आंदोलन में खुलकर हिस्सा लेना शुरू किया.

5 साल पहले लकवाग्रस्त हो जाने के कारण वे शारीरिक रूप से असमर्थ हो चले थे. परिजनों ने उनका पूरा ख्याल रखा और देख-रेख की. उन्होंने हमेशा ही भ्रष्टाचार व घूसखोरी के खिलाफ संघर्ष किया और ईमानदारी और मेहनत की पताका बुलंद की. इस वजह से वे हमेशा ही भ्रष्ट तंत्र की आंखों में खटकते भी रहे. वे अपने पीछे अपनी चार संतानों समेत एक भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. ‘हरिनंदन सिंह अमर रहें’ के गूंजते नारों के बीच उनके पैतृक गांव मखमिलपुर (अरवल) के पास पुनपुन के कोइली घाट पर उन्हें अंतिम विदाई दी गई. मखमिलपुर गांव में एक सभा आयोजित कर जिसमें भारी तादाद में गांव के महिला-पुरुष, वृद्धजन व बच्चे शामिल हुए, उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई.
‘कामरेड हरिनंदन सिंह को लाल सलाम !!’

वर्ष28
अंक29