संपादकीय

सड़कों पर लोकतंत्र का परचम बुलंद करें! जनविरोधी, दमनकारी कानूनों के विरुद्ध एकजुट हों!

मोदी सरकार द्वारा संसदीय लोकतंत्र को कैसे छलावे में तब्दील कर दिया गया है, हाल ही में संपन्न संसद का मानसून सत्र इसकी बानगी है. प्रश्न काल को मनमाने तरीके से रद्द कर दिया गया और इस तरह से उस औपचारिक धारणा से भी सरकार ने मुक्ति पा ली कि सरकार और कार्यपालिका, विधायिका के प्रति और प्रकारांतर से जनता के प्रति जवाबदेह हैं.

मोदी के कृषि विधेयक: भारतीय किसानों पर जानलेवा आघात

भारत के लोगों को नरेन्द्र मोदी के “अच्छे दिन” की बयानबाजी का असली अर्थ खोजने में काफी समय लगा था, लेकिन उनके ताजातरीन “आत्मनिर्भर भारत” के खोखले जुमले का भेद बहुत तेजी से खुलता जा रहा है. मोदी सरकार के लिये “आत्मनिर्भर भारत” का सिर्फ एक ही मतलब है – समूचे भारतीय अर्थतंत्र को अडानी-अंबानी इंटरप्राइज में बदल देना!

दिल्ली पुलिस की “दंगा जांच” समान नागरिकता के पक्षधर प्रतिवादकारियों के दमन के अलावा और कुछ नहीं

वामपंथी नेताओं को चार्जशीट में नामजद करने के बाद छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद की गिरफ्तारी होते ही दिल्ली पुलिस की “दंगा जांच” की आलोचना तथा उसकी घोर निंदा और तेज हो गई है. छात्रों के साथ-साथ देश भर में बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने, जिनमें यहां तक कि भूतपूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं, दिल्ली के पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर दिल्ली पुलिस द्वारा की जा रही “जांच” के पक्षपातपूर्ण रवैये पर पीड़ा जाहिर की है.

कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों और गोता खाते जीडीपी के बीच अनवरत जारी विध्वंस का नाम है मोदी सरकार

वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही का सरकारी आर्थिक रिपोर्ट कार्ड अब हमारे सामने है. सकल घरेलू उत्पाद भहराकर 23.9 प्रतिशत गिर चुका है, जो भारत के साथ तुलनीय किसी भी देश की अपेक्षा दुनिया में सबसे खराब प्रदर्शन है. पिछले चार दशकों में इससे पहले कभी भी भारतीय अर्थतंत्र ने नकारात्मक वृद्धि दर नहीं रिकार्ड की थी. ये अनुमान शुरूआती हैं, और अर्थशास्त्रियों का ऐसा यकीन है कि वास्तविक अंतिम आंकड़े इससे कहीं ज्यादा खराब हो सकते हैं.

दो सख्त ट्वीटों और दुष्प्राप्य क्षमायाचना की तलाश में एक मनमाने फैसले की कहानी

बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय! जिस हड़बड़ी में सोचे-समझे बिना सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत भूषण द्वारा किये गये दो ट्वीटों को अदालत की अवमानना का दोषी ठहरा दिया, उससे यही कहावत याद आती है. अदालत में दो सुनवाइयों के बाद भी सर्वोच्च न्यायालय उन दो अपराधी ट्वीटों के लिये कोई उपयुक्त सजा नहीं ढूंढ पाया है!

आजादी के आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि लोकतंत्र है, जिसे हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए

भारत ने अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस महामारी के प्रकोप के बीच मनाया. जहां बहुत सारे देश कोविड-19 महामारी के कहर से उबर रहे हैं, वहीं भारत में प्रति दिन नए 60000 मामलों के साथ ग्राफ लगातार तीखे उठान पर है. 25 लाख मामलों और लगभग 50 हजार मौतों के साथ 2020 के स्वतंत्रता दिवस के दिन माहौल बहुत उदासी भरा था. खराब तरह से थोपे गए और भयानक रूप से अनियोजित लाॅकडाउन ने इस उदासी को और भी गहरा दिया है क्यूंकि भारत की जनता का बड़ा हिस्सा भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है. यह आर्थिक संकट, सबसे कमजोर हिस्सों के लिए अस्तित्व के संकट में परिणत हो चुका है.

स्वाधीनता दिवस 2020 का संकल्प: फासीवाद से आजादी

अगस्त भारत की स्वाधीनता प्राप्ति का महीना है. इस वर्ष जब भारत देश की स्वाधीनता की 73वीं वर्षगांठ मना रहा है, तो जाहिर है कि ये समारोह अनिवार्यतः अभूतपूर्व ठंडेपन से ही मनाये जायेंगे. सिर्फ इसलिये नहीं कि कोविड-19 से बचाव की नियमावनी के अंग के बतौर लोगों के सभा-सम्मेलन में एकत्रित होने पर अनिवार्य प्रतिबंध लागू हैं तथा नागरिकों से आपस में जो शारीरिक दूरी बनाये रखने की उम्मीद की जाती है, बल्कि इससे भी कहीं ज्यादा इस वजह से कि हमारे दैनंदिन आकाश पर अंधेरे और अनिश्चयता के काले बादल मंडरा रहे हैं.

बिहार के चुनाव को चोरी-छिपे हथियाने की भाजपा-जद(यू) की साजिश को नाकाम करेें

भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने, जो लम्बे अरसे तक चले भारत के लाॅकडाउन के दौरान अभी तक गायब थे, अचानक प्रकट होकर इसी 7 जून को बिहार में आयोजित एक ‘डिजिटल रैली’ को सम्बोधित किया. कहने को तो शाह ने इसे लोगों से ‘जन संवाद’ बताया, मगर हर सूरत में इस रैली ने इस साल के अंतिम महीनों में निर्धारित बिहार विधानसभा चुनाव के लिये भाजपा के प्रचार अभियान की शुरूआत कर दी है.

अमरीका में जारी नस्लवादी-विरोध की लहरें और भारत में उसकी अनुगूंज

अमरीका में आजकल संस्थागत नस्लवादी पक्षपात और पुलिस द्वारा बर्बर हिंसा के खिलाफ आंदोलन में बड़े पैमाने का उभार आया हुआ है. इस उभार का कारण बनी हाल की एक घटना, जिसमें मिनेपोलिस के श्वेत पुलिस अधिकारियों ने एक अफ्रीकी-अमरीकी अश्वेत पुरुष जार्ज फ्रलाॅयड को सड़क पर मुंह के बल लिटा दिया, और उनमें से एक पुलिस अधिकारी ने फ्रलाॅयड की गर्दन को अपने घुटने से दबाये रखा. तमाम लोगों के सामने उस पुलिसवाले ने फ्रलाॅयड का गला घोंटना जारी रखा जबकि फ्रलाॅयड लगातार चीख रहे थे कि उनका दम घुट रहा है और वे मर रहे हैं.

कार्ल मार्क्‍स का 202 वां जन्‍मदिन: कोविड-19 के संकट के बहाने तानाशाही और नियंत्रण की कोशिशों का विरोध करो! इस संकट को सामूहिक प्रतिरोध और सामाजिक बदलाव के अवसर में बदल दो!

मार्क्‍स पूरी तरह से क्रांतिकारी यथार्थवादी थे. उनके लिए बुनियादी पदार्थ ही यथार्थ था. गति पदार्थ के अस्तित्‍व का रूप है. उनके चिंतन की जड़ें ठोस सामाजिक यथार्थ में धंसी हुई थीं. लेकिन यथार्थ को स्‍वीकार करने का अर्थ यथास्थितिवाद को जायज ठहराना कतई नहीं था. उनके लिए यथार्थ को स्‍वीकार करने का मतलब सामाजिक यथार्थ में आमूल बदलाव और गुलामी से मुक्ति का हर संभव प्रयास करना था.