लेख

पुस्तक समीक्षा : ‘एका’ किसान आन्दोलन और आजादी की लड़ाई में वर्ग हितों की टकराहट का दस्तावेज

1920 से 1928 के बीच अवध के दो महान किसान नेताओं बाबा रामचंद्र और मदारी पासी के नेतृत्व में चले किसान संघर्षों के बारे में एक किताब को देखना और पढ़ना मेरे जैसे कार्यकर्ताओं के लिए एक सुखद अनुभूति है. नवारुण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और राजीव कुमार पाल द्वारा लिखित ‘एका’ नाम की पुस्तक हमें किसान आन्दोलन के उस इतिहास और उन वीर नायकों से परिचित करा रही है.

जनगीतों में कामरेड चारु मजुमदार

16 जुलाई 1972 को कलकत्ते के एक आश्रय स्थल से का. चारु मजुमदार गिरफ्तार किए गए. गिरफ्तारी के बाद लाल बाजार के सेन्ट्रल लाॅक अप में 12 दिनों तक उन्हें घोर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी जिनमें उनके लिए जरूरी पैथिड्रीन इंजेक्शन व अन्य दवाइयों को बन्द कर देना भी था, उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. 28 जुलाई 1972 को का. चारु मजुमदार ने आखिरी सांस ली. लेकिन, उनकी शहादत के बाद भी न तो नक्सलबाड़ी आंदोलन को खत्म किया जा सका और न ही उसकी ताप व ऊर्जा से पैदा हुई उस नई पार्टी को, जिसे हम सभी भाकपा-माले के रूप में जानते हैं.

कामरेड चारु मजुमदार की जन्मशतवार्षिकी पर उनकी याद में : मेरे पिता, मेरे नायक

– अनिता मजुमदार
(कोलकाता से प्रकाशित बांग्ला महिला त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन प्रतिबिधान’ के शरद विशेषांक, 2001 में छपे मूल लेख से अनूदित, समकालीन प्रकाशन, पटना द्वारा प्रकाशित हिंदी पुस्तिका ‘चारु मजुमदार: व्यक्तित्व और विरासत’ से साभार – सं.)

1962 में भारत-चीन युद्ध के परिणामस्वरूप जेल की सजा काट कर जब मेरे पिता लौटे तब मेरा ध्यान एक ऐसी चीज के प्रति गया जो उनमें पहले कभी नहीं देखी थी – कह सकते हैं कि एक तरह की बेचैनी, ऐसा लगता था कि वे किसी नई चीज की तलाश में हैं.

कोई भी लोकतांत्रिक देश अपने किसी हिस्से की आकांक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता

लोकसभा चुनाव 2019 के अपने संकल्प पत्र में राम मंदिर निर्माण, संविधान की धारा 370 की समाप्ति और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे मुद्दों को सर्वप्रमुख बनाकर भाजपा न केवल वोटों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश में है बल्कि यह भाजपा-संघ द्वारा भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के उनके लक्ष्य की खुलेआम घोषणा भी है. आरएसएस-भाजपा ने संविधान के अनुच्छेद 35-ए व धारा 370 के बारे में ऐसा प्रचार रखा है, मानो इसी के कारण जम्मू और कश्मीर में अलगाववाद पैदा होता है. भारत के बड़े हिस्से में इस धारणा को जगह भी मिली हुई है.