लेख

कारपोरेट की गुलामी किसानों को बर्दाश्त नहीं

पिछले तीन वर्षों से कर्ज मुक्ति और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार कुल लागत का डेढ़ गुना दाम की मांग पर चल रहे देश के किसान आन्दोलन में अब एक जबरदस्त उबाल आ गया है. मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि सम्बन्धी तीन अध्यादेशों को कानून बनाने के खिलाफ देश का किसान सड़कों पर है. पिछले साढ़े छः वर्षों के शासन काल में पहली बार किसी आन्दोलन के दबाव में मोदी सरकार के कैबनेट मंत्री को इस्तीफा देकर सरकार के कदम का विरोध करने पर मजबूर होना पड़ा है.

धीरे बहे सरयू रे

– अरिंदम सेन  -- 

बाबरी मस्जिद के ध्वंसावशेष पर राम मंदिर के वास्तविक निर्माण के साथ, और वह भी भारत के एकमात्र मुस्लिम-बहुल राज्य में बर्बर दमन लादे जाने की सबसे लंबी और अब तक जारी अवधि की वर्षगांठ पर, सरयू किनारे की मंदिर नगरी को भगवा राजनीति का ताजा रंग दे दिया गया है. और, इसे गौरवशाली व शक्तिशाली हिंदू राष्ट्र के सर्वप्रमुख ‘राष्ट्रीय’ प्रतीक के बतौर उछाला जा रहा है जिसने ‘भगवान राम’ की कथित जन्मभूमि को ‘आंतरिक दुश्मन बन बैठे विदेशी आक्रांताओं’ के चंगुल से अब मुक्त करा लिया है.

कोरोना संकट की आड़ में तानाशाही की ओर बढ़ रही सरकारें

कोरोना की आड़ में सरकारें कड़े कानून बना कर तानाशाही को ओर बढ़ रही हैं. हमारे देश में महामारी से लड़ने हेतु एक कानून अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है जिसे ‘महामारी रोग अधिनियम, 1897’ के नाम से जाना जाता है. इस ऐक्ट के अंतर्गत पारित आदेशों का उलंघन आईपीसी की धारा-188 में दंडनीय है जिसमें एक महीने की साधारण जेल और 200 रुपया जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

वहाग वैभव की कविताए : कोई ऐसा शब्द कहो

कोई ऐसा शब्द कहो
जिसका सचमुच कोई अर्थ हो

कोई ऐसी नदी दिखाओ
जिसमें न बह रहा हो हमारी आंख का पानी

कोई ऐसा फूल उपहार में दो
जिसकी गंध बाजार में न बिकती हो

अपने प्रेम और घृणा के लिए दलीलें देना बंद करो
ताकि मैं भरोसे पर पुनः भरोसा कर सकूं

अर्थ, रस, गंध और स्पर्श
सब अपनी सवारियों से पलायन कर रहे हैं
और यही इस दौर की सबसे विकराल महामारी है

अगर नहीं तो
एक ऐसे मनुष्य से मिलाओ
जिसे मनुष्य कहकर पुकारूं और वह पलटकर जवाब भी दे.

पुस्तक समीक्षा : ‘एका’ किसान आन्दोलन और आजादी की लड़ाई में वर्ग हितों की टकराहट का दस्तावेज

1920 से 1928 के बीच अवध के दो महान किसान नेताओं बाबा रामचंद्र और मदारी पासी के नेतृत्व में चले किसान संघर्षों के बारे में एक किताब को देखना और पढ़ना मेरे जैसे कार्यकर्ताओं के लिए एक सुखद अनुभूति है. नवारुण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और राजीव कुमार पाल द्वारा लिखित ‘एका’ नाम की पुस्तक हमें किसान आन्दोलन के उस इतिहास और उन वीर नायकों से परिचित करा रही है.

जनगीतों में कामरेड चारु मजुमदार

16 जुलाई 1972 को कलकत्ते के एक आश्रय स्थल से का. चारु मजुमदार गिरफ्तार किए गए. गिरफ्तारी के बाद लाल बाजार के सेन्ट्रल लाॅक अप में 12 दिनों तक उन्हें घोर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी जिनमें उनके लिए जरूरी पैथिड्रीन इंजेक्शन व अन्य दवाइयों को बन्द कर देना भी था, उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया. 28 जुलाई 1972 को का. चारु मजुमदार ने आखिरी सांस ली. लेकिन, उनकी शहादत के बाद भी न तो नक्सलबाड़ी आंदोलन को खत्म किया जा सका और न ही उसकी ताप व ऊर्जा से पैदा हुई उस नई पार्टी को, जिसे हम सभी भाकपा-माले के रूप में जानते हैं.

कामरेड चारु मजुमदार की जन्मशतवार्षिकी पर उनकी याद में : मेरे पिता, मेरे नायक

– अनिता मजुमदार
(कोलकाता से प्रकाशित बांग्ला महिला त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन प्रतिबिधान’ के शरद विशेषांक, 2001 में छपे मूल लेख से अनूदित, समकालीन प्रकाशन, पटना द्वारा प्रकाशित हिंदी पुस्तिका ‘चारु मजुमदार: व्यक्तित्व और विरासत’ से साभार – सं.)

1962 में भारत-चीन युद्ध के परिणामस्वरूप जेल की सजा काट कर जब मेरे पिता लौटे तब मेरा ध्यान एक ऐसी चीज के प्रति गया जो उनमें पहले कभी नहीं देखी थी – कह सकते हैं कि एक तरह की बेचैनी, ऐसा लगता था कि वे किसी नई चीज की तलाश में हैं.

कोई भी लोकतांत्रिक देश अपने किसी हिस्से की आकांक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता

लोकसभा चुनाव 2019 के अपने संकल्प पत्र में राम मंदिर निर्माण, संविधान की धारा 370 की समाप्ति और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर जैसे मुद्दों को सर्वप्रमुख बनाकर भाजपा न केवल वोटों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश में है बल्कि यह भाजपा-संघ द्वारा भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के उनके लक्ष्य की खुलेआम घोषणा भी है. आरएसएस-भाजपा ने संविधान के अनुच्छेद 35-ए व धारा 370 के बारे में ऐसा प्रचार रखा है, मानो इसी के कारण जम्मू और कश्मीर में अलगाववाद पैदा होता है. भारत के बड़े हिस्से में इस धारणा को जगह भी मिली हुई है.