धरना/प्रदर्शन/प्रतिरोध

हाथरस आंदोलन 2012 के दिल्ली आंदोलन से भिन्न है


2012-13 में दिल्ली बस गैंगरेप की घटना के बाद सैकड़ों नवयुवा भारतवासी सड़कों पर उतर पड़े थे. उनके गुस्से और झुंझलाहट के बीच सामाजिक जागृति और संस्थागत बदलावों की संभावना भी उम्मीद की एक किरण बनी हुई थी. पहली बार बलात्कार की संस्कृति, पीड़िता को दोषी मानने और सुरक्षा के नाम पर महिलाओं की स्वायत्तता पर हमले को लेकर नारीवादी चिंताओं से समाज भी जुड़ता नजर आ रहा था. ऐसा लग रहा था कि एक लंबे समय बाद शासन यह मानने को बाध्य हो सकता है कि यौन हिंसा रोकने वाले मौजूदा कानूनों ने पीड़ितों के तमाम कटु अनुभवों को दरकिनार कर रखा है.

हाथरस गैंग रेप व हत्याकांड के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का तांता लगा

हाथरस की झकझोर देने वाली घटना तथा महिलाओं पर लगातार बढती हिंसा की घटनाओं के खिलाफ ऐपवा, आइसा व भाकपा(माले) के बैनर तले देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार प्रतिवाद कार्यक्रम हो रहे हैं. ऐपवा महासचिव का. मीना तिवारी के नेतृत्व में बिहार के मुजफ्फरपुर, ऐपवा की बिहार राज्य सचिव का. शशि यादव की अगुआई में पटना के चितकोहरा, का. लक्ष्मी कृष्णन के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ के भिलाई, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का. सुधा चौधरी के नेत्त्व में राजस्थान के उदयपुर तथा दिल्ली में आइसा नेताओं की अगुआई में जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन हुए. उत्तर प्रदेश, प.

झूठे मुकदमे के खिलाफ एसडीपीओ का घेराव --  फिर एक नया झूठा मुकदमा दर्ज हुआ

बगोदर विधानसभा क्षेत्र (झारखंड) में महिलाओं पर बेहद अमर्यादित व अश्लील टिप्पणी करनेवाले भाजपा-बजरंग दल के लंपटों की नकेल कसने के बजाय उनको संरक्षण देने और बजरंग दल से जुड़े एक लंपट को पकड़कर पुलिस को सौंपने पर ऐपवा और इंकलाबी नौजवान सभा के आधे दर्जन से अधिक नेताओं-कार्यकताओं पर झूठे मुकदमे करने के खिलाफ भाकपा(माले), इंकलाबी नौजवान सभा, आइसा और ऐपवा ने विगत 21 सिंतबर 2020 को बगोदर-सरिया अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी कार्यालय का घेराव किया.

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों में देशव्यापी उबाल 

देश की खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनाने वाले तीन कानूनों को जबरन संसद में पारित किए जाने के विरोध में देश के किसानों और खेत मजदूरों ने 25 सितम्बर 2020 को अपने राष्ट्रव्यापी संघर्ष का बिगुल बजा दिया है. अनुमान है कि 25 सिम्बर को देश भर में एक लाख से ज्यादा स्थानों पर विरोध कार्यक्रम आयोजित हुए और दो करोड़ से ज्यादा लोगों ने इनमें सक्रिय भाग लिया. राष्ट्रपति द्वारा 27 सितम्बर को तीनों कृषि बिलों पर हस्ताक्षर कर दिए जाने के बाद भी किसानों का यह आन्दोलन देश भर में लगातार जारी है.

सड़कों पर उतरे किसान, वाम दलों व मजदूर संगठनों का मिला साथ

कसानों के हाथ से खेती छीनकर कारपोरेटों के हवाले कर देने वाले कृषि बिलों के खिलाफ किसान संगठनों के 25 सितंबर के राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद के आह्वान पर पटना में भाकपा(माले) महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य और अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव व पूर्व विधायक राजाराम सिंह सहित सैकड़ों भाकपा(माले) और किसान सभा कार्यकर्ता सड़क पर उतरे और अपना प्रतिवाद दर्ज किया.

किसान संगठनों का राष्ट्रव्यापी प्रतिवाद

मोदी सरकार के तीनों किसान बिलों का विरोध करते हुए देश भर में किसान संगठनों ने सरकार का पुतला फूंका और विरोध मार्च व सड़क जाम कार्यक्रम को सफल बनाया. अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड राजाराम सिंह ने बिहार के ओबरा में मोदी सरकार के पुतला दहन कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा कि मोदी और नीतीश कुमार देश व राज्य के किसानों के साथ धोखा कर रहे हैं. अगर सरकार किसानों को आजादी दे रही है तो किसानों व उसके संगठनों से बात करने से क्यों डर रही है?

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का देशव्यापी धरना प्रदर्शन

श्रमिक अधिकारों को रौंदने वाली चार श्रम संहिताओं, विनाशकारी तीन कृषि कानूनों, बिजली की दरों में बेतहाशा वृद्धि तथा कर्मचारियों के हितों पर कुठाराघात करने वाला बिजली सुधार अधिनियम 2020, एलआईसी, रेलवे, कोयला खदानों के निजीकरण, केंद्र-राज्य तथा पेंशनरों के महंगाई भत्ते की वृद्धि पर रोक, अर्थव्यवस्था का सर्वनाश, अब तक की सबसे बड़ी बेरोजगारी, डीजल-पेट्रोल के दामों में बेतहाशा वृद्धि, विकराल महंगाई, असंगठित क्षेत्र तथा प्रवासी श्रमिकों की तबाही आदि के विरुद्ध 23 सितंबर 2020 को देश की 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों तथा स्वतंत्र फेडरेशनों ने धरना-प्रदर्शन का देशव्यापी कार्यक्र

प्रधानमंत्री के जन्म दिवस को राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया

17 सितंबर 2020, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन को देश के छात्र-नौजानों ने राष्ट्रीय बेरोजगार दिवस के रूप में मनाया.

बिहार में आशा का दो दिवसीय राज्यव्यापी प्रदर्शन

बिहार राज्य आशा कार्यकर्ता संघ (ऐक्टू-गोप गुट) के बैनर तले कोरोना वारियर्स और घर-घर की स्वास्थ्य कार्यकर्ता आशाओं ने विगत 22-23 सितंबर, 2020 को दोदिवसीय राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाया और 200 से अधिक सीएचसी व पीएचसी तथा सिविल सर्जन कार्यालयों पर आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन व धरना कार्यक्रम आयोजित कर सरकार से 1000 रु. प्रति माह मासिक मानदेय देने, पूर्व के समझौते का क्रियान्वयन, कोरोना भत्ता देने और बकाया भुगतान की मांग की. हजारों आशा कर्मियों ने इसमें उत्साहपूर्ण भागीदारी की.

ऐक्टू ने मजदूर विरोधी श्रम कोड की प्रतियां जलाईं

मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 44 महत्वपूर्ण श्रम कानूनों को रद्द करके श्रमिकों के अधिकारों को छीनने के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है. संसद का मानसून सत्र, जो एक लंबे अंतराल के बाद हो रहा है, उसे इस तरह सूत्रबद्ध किया गया है कि लाखों श्रमिकों और किसानों से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर चर्चा ही ना हो. जिस तरह से व्यापक विरोध के बावजूद मोदी सरकार तमाम मजदूर व किसान विरोधी कानून बना रही है, वह साफ तौर पर सरकार के मजदूर विरोधी और कारपोरेट समर्थक रुख को दर्शाता है.